उद्योगपर्व — गान्धारी-उपदेशः
Udyoga Parva — Gandhārī’s Counsel to Duryodhana
वेशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दुर्योधनकी बातें सुनकर श्रीकृष्णके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे कुछ विचार करके कौरवसभामें दुर्योधनसे पुनः इस प्रकार बोले-- ।। लप्स्यसे वीरशयनं काममेतदवाप्स्यसि । स्थिरो भव सहामात्यो विमर्दो भविता महान्,“दुर्योधन! तुझे रणभूमिमें वीर-शय्या प्राप्त होगी। तेरी यह इच्छा पूर्ण होगी। तू मन्त्रियोंसहित धैर्यपूर्वक रह। अब बहुत बड़ा नरसंहार होनेवाला है
vaiśampāyana uvāca—janamejaya! duryodhanasya vacaḥ śrutvā śrīkṛṣṇasya netre krodhena lohitābhavatām. sa kiñcid vicārya kauravasabhāyāṃ duryodhanaṃ punar evam uvāca—
“lapsyase vīraśayanaṃ kāmam etad avāpsyasi | sthiro bhava sahāmātyo vimardo bhavitā mahān ||”
वैशम्पायन बोले—“हे जनमेजय! दुर्योधन की बातें सुनकर श्रीकृष्ण के नेत्र क्रोध से लाल हो उठे। कुछ विचार कर उन्होंने कौरवसभा में दुर्योधन से फिर कहा—‘तू रणभूमि में वीर-शय्या पाएगा; तेरी यह कामना अवश्य पूर्ण होगी। मन्त्रियों सहित धैर्य धारण कर; अब महान् संहार होने वाला है।’”
वैशम्पायन उवाच