Udyoga-parva Adhyāya 123 — Bhīṣma–Droṇa–Vidura Upadeśa to Duryodhana
Keśava-vākya aftermath
यो<र्थकामस्य वचन प्रातिकूल्यान्न मृष्यते । शृणोति प्रतिकूलानि द्विषतां वशमेति स:
जो अपने ही हित चाहने वाले सुहृद के वचनों को मन के प्रतिकूल होने से सहन नहीं करता और शत्रुओं के प्रतिकूल वचनों को ही सुनता है, वह उनके वश में हो जाता है।
वैशम्पायन उवाच