Adhyāya 12: Devas’ Petition to Nahūṣa; Bṛhaspati on Śaraṇāgata-Dharma; Indrāṇī’s Strategic Delay
अस्या हित॑ भवेद् यच्च मम चापि हित॑ भवेत् | क्रियतां तत् सुरश्रेष्ठा न हि दास्याम्यहं शचीम्,श्रेष्ठ देवताओ! जो इनके लिये हितकर हो, जिससे मेरा भी हित हो, वह कार्य आपलोग करें। मैं शचीको कदापि नहीं दूँगा
asyā hitaṁ bhaved yac ca mama cāpi hitaṁ bhavet | kriyatāṁ tat suraśreṣṭhā na hi dāsyāmy ahaṁ śacīm ||
श्रेष्ठ देवगण! जो इनके लिए हितकर हो और जिससे मेरा भी हित हो, वही उपाय आप लोग करें। मैं शची को कदापि नहीं दूँगा।
शल्य उवाच