नारदकथितं माधव्याः तपश्चर्या–ययातेः स्वर्गविचारः | Nārada on Mādhavī’s Asceticism and the Scrutiny of Yayāti in Heaven
गरुड़सहित गालव भी गुरुदक्षिणा देकर मन-ही-मन अत्यन्त संतुष्ट हो राजकन्या माधवीसे इस प्रकार बोले--'सुन्दरी! तुम्हारा पहला पुत्र दानपति
gālavastvabhyanujñāya suparṇaṃ pannagāśanam | pitur niryātya tāṃ kanyāṃ prayayau vanam eva ha ||
ऐसा कहकर सर्पभोजी सुपर्ण गरुड़ से आज्ञा लेकर गालव उस राजकन्या को उसके पिता ययाति के पास पहुँचा आए और फिर स्वयं वन की ओर ही चले गए।
नारद उवाच