धन-निरुक्ति तथा गालवस्य गुरुदक्षिणा-प्रसङ्गः
Etymology of Wealth and the Gurudakṣiṇā Predicament of Gālava
तदायुष्मन् खगपते यथेष्टं गम्पतामित: । न च ते गर्हणीयाहं गर्हितव्या: स्त्रियः क्वचित्,“अतः आयुष्मन् पक्षिराज! अब तुम यहाँसे अपने अभीष्ट स्थानको जाओ। आजसे तुम्हें मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये। मेरी ही क्यों, कहीं किसी भी स्त्रीकी निन््दा करनी उचित नहीं है
“अतः आयुष्मन् पक्षिराज! अब तुम यहाँ से अपने अभीष्ट स्थान को जाओ। और अब से तुम्हें मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिए; ही नहीं, कहीं भी किसी स्त्री की निन्दा करना उचित नहीं है।”
नारद उवाच