Adhyaya 2
Svargarohana ParvaAdhyaya 254 Verses

Adhyaya 2

Svargārohaṇa-parva Adhyāya 2 — Yudhiṣṭhira’s Inquiry for His Kin and the Vision of a Punitive Realm

Upa-parva: Naraka-darśana (Yudhiṣṭhira’s Descent and Inquiry Episode)

This chapter opens with Yudhiṣṭhira addressing the devas, stating that he does not see Rādheya (Karṇa) nor his brothers and other eminent allies who fell in the war for his sake. He declares that a heaven without them is not ‘his’ heaven, and requests to see them. The devas consent and appoint a divine messenger. Yudhiṣṭhira follows the messenger along a dark, difficult path characterized by foul odors and vivid descriptions of a punitive environment: rivers of hot water, an asipatravana (razor-leaf forest), heated sands and iron stones, boiling oil cauldrons, thorny kūṭaśālmalī trees, and scenes of torment. Overwhelmed, he asks how far they must go and where his brothers are. The messenger indicates the limit of his escort and invites Yudhiṣṭhira to return if fatigued. As Yudhiṣṭhira turns back, he hears afflicted voices requesting him to remain briefly, saying that a purifying breeze follows him and grants them relief. He asks who they are; the voices identify themselves as Karṇa, Bhīma, Arjuna, the twins, Dhṛṣṭadyumna, Draupadī, and the Draupadeyas. Yudhiṣṭhira reflects on the apparent contradiction of their presence there, questions karmic causality and the status of Suyodhana elsewhere, and experiences anger, censuring the devas and dharma as he understands it. He then tells the messenger to return and report that he will not go back, since his presence brings comfort to his kin; the messenger conveys this intent to Indra.

Chapter Arc: स्वर्ग के द्वार पर पहुँचा युधिष्ठिर देवताओं से कह उठता है—“नेह पश्यामि विबुधाः…”—मुझे यहाँ वे नहीं दिखते जिनके बिना स्वर्ग भी सूना है; मेरे भाई, पाञ्चाली, और वे राजर्षि कहाँ हैं जो मेरे कारण रण में गिरे? → देवगण उसे स्मरण कराते हैं कि जिन महारथियों ने ‘रणवल्नल’ में देह की आहुति दी, उन्होंने लोक जीता; पर युधिष्ठिर का मन स्वर्ग-वैभव में नहीं टिकता—वह पाञ्चाली और भीम को देखने की जिद करता है और स्पष्ट कह देता है कि उनके बिना वह यहाँ नहीं रहेगा। → देवदूत उसे नरक-दर्शन कराता है: कटे अंग, रक्त-मेद, दुर्गन्ध, करुण क्रन्दन—और वहीं वे पीड़ित प्राणी युधिष्ठिर की उपस्थिति से क्षणिक शान्ति पाते हैं; उनकी दीन वाणी सुनकर दयावान राजा ठिठक जाता है और निर्णय करता है कि वह उन्हें छोड़कर नहीं जाएगा। → युधिष्ठिर देवदूत से कहलवाता है—“न हाहं तत्र यास्यामि स्थितोऽस्मीति निवेद्यताम्”—मैं यहीं रहूँगा; मेरे आश्रय से ये (और मेरे भाई) सुखी हों—यह संदेश इन्द्र तक पहुँचा दिया जाए। → देवदूत इन्द्र के पास जाकर युधिष्ठिर के निश्चय का निवेदन करता है—अब देवसभा क्या उत्तर देगी, और यह नरक-दर्शन किस सत्य की परीक्षा है?

Shlokas

Verse 1

औपनआक्राा बछ। आर: 2 द्वितीयो&्ध्याय: युधिष्ठिरको नरकका दर्शन कराना तथा करुण-क्रन्दन सुनकर उनका वहीं रहनेका निक्षय करना युधिछिर उवाच नेह पश्यामि विबुधा राधेयममितौजसम्‌ | भ्रातरौ च महात्मानौ युधामन्यूत्तमौजसौ,युधिष्ठिरने पूछा--देवताओ! मैं यहाँ अमित-तेजस्वी राधानन्दन कर्णको क्‍यों नहीं देख रहा हूँ? दोनों भाई महामनस्वी युधामन्यु और उत्तमौजा कहाँ हैं? वे भी नहीं दिखायी देते

युधिष्ठिर बोले—हे देवगण! मैं यहाँ अमित-पराक्रमी राधेय (कर्ण) को नहीं देखता। और वे दोनों महात्मा भाई—युधामन्यु और उत्तमौजा—कहाँ हैं? वे भी दिखाई नहीं देते।

Verse 2

जुह॒वुर्ये शरीराणि रणवल्नलौ महारथा: । राजानो राजपुत्राश्न ये मदर्थे हता रणे,जिन महारथियोंने समराग्निमें अपने शरीरोंकी आहुति दे दी, जो राजा और राजकुमार रणभूमिमें मेरे लिये मारे गये वे सिंहके समान पराक्रमी समस्त महारथी वीर कहाँ हैं? क्या उन पुरुषप्रवर वीरोंने भी इस स्वर्गलोकपर विजय पायी है? इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि युधिष्ठटिरनरकदर्शने द्वितीयो5ध्याय:

युधिष्ठिर बोले—वे सिंह-समान पराक्रमी वीर कहाँ हैं, जिन्होंने रणाग्नि में अपने शरीरों की आहुति दे दी? वे राजा और राजकुमार कहाँ हैं जो मेरे लिए युद्धभूमि में मारे गए? क्या उन पुरुषप्रवर शूरों ने भी इस स्वर्गलोक पर विजय पाई है?

Verse 3

क्व ते महारथा: सर्वे शार्ट्लसमविक्रमा: । तैरप्ययं जितो लोक: कच्चित्‌ पुरुषसत्तमै:,जिन महारथियोंने समराग्निमें अपने शरीरोंकी आहुति दे दी, जो राजा और राजकुमार रणभूमिमें मेरे लिये मारे गये वे सिंहके समान पराक्रमी समस्त महारथी वीर कहाँ हैं? क्या उन पुरुषप्रवर वीरोंने भी इस स्वर्गलोकपर विजय पायी है?

युधिष्ठिर बोले—व्याघ्र-समान पराक्रम वाले वे सब महारथी अब कहाँ हैं? जिन्होंने रणाग्नि में अपने शरीरों की आहुति दी, क्या उन पुरुषसत्तमों ने भी इस स्वर्गलोक को जीत लिया है?

Verse 4

यदि लोकानिमान_ प्राप्तास्ते च सर्वे महारथा: । स्थितं वित्त हि मां देवा: सहित तैर्महात्मभि:

युधिष्ठिर बोले—यदि वे सब महारथी इन लोकों को प्राप्त हो चुके हैं और यदि वे सभी यहाँ उपस्थित हैं, तो यह निश्चित जानो कि देवताओं ने मुझे भी उन महात्माओं के साथ ही यहाँ ठहराया है।

Verse 5

देवताओ! यदि वे सम्पूर्ण महारथी इन लोकोंमें आये हैं तो आप समझ लें कि मैं उन महात्माओंके साथ रहूँगा ।। कच्चिन्न तैरवाप्तो<5यं नृपैलोको$क्षय: शुभ: । न तैरहं विना रंस्ये भ्रातृभिज्ञातिभिस्तथा,परंतु यदि उन नरेशोंने यह शुभ एवं अक्षयलोक नहीं प्राप्त किया है तो मैं उन जाति- भाइयोंके बिना यहाँ नहीं रहूँगा

युधिष्ठिर बोले—हे देवगण! यदि वे समस्त महारथी इन लोकों में आ गए हैं, तो यह जान लें कि मैं उन महात्माओं के साथ ही रहूँगा। परंतु यदि उन नरेशों ने यह शुभ और अक्षय लोक नहीं पाया है, तो मैं उनके बिना—अपने भाइयों और कुटुम्बियों के बिना—यहाँ आनंद नहीं करूँगा।

Verse 6

मातुर्हि वचन श्रुव्वा तदा सलिलकर्मणि । कर्णस्य क्रियतां तोयमिति तप्यामि तेन वै

युधिष्ठिर बोले—सलिलकर्म (तर्पण) के समय माता का वचन सुनकर मैं इसी से व्यथित हूँ—‘कर्ण के लिए भी जल अर्पित किया जाए।’

Verse 7

युद्धके बाद जब मैं अपने मृत सम्बन्धियोंको जलाञज्जलि दे रहा था उस समय मेरी माता कुन्तीने कहा था--“बेटा! कर्णको भी जलाञ्जलि देना।” माताकी यह बात सुनकर मुझे मालूम हुआ कि महात्मा कर्ण मेरे ही भाई थे। तबसे मुझे उनके लिये बड़ा दुःख होता है ।। इदं च परितप्यामि पुन: पुनरहं सुरा: । यन्मातु: सदृशौ पादौ तस्याहममितात्मन:,देवताओ! यह सोचकर तो मैं और भी पश्चात्ताप करता रहता हूँ कि “महामना कर्णके दोनों चरणोंको माता कुन्तीके चरणोंके समान देखकर भी मैं क्यों नहीं शत्रुदलमर्दन कर्णका अनुगामी हो गया?” यदि कर्ण हमारे साथ होते तो हमें इन्द्र भी युद्धमें परास्त नहीं कर सकते

युधिष्ठिर बोले—युद्ध के बाद जब मैं अपने मृत सम्बन्धियों को जलाञ्जलि दे रहा था, तब मेरी माता कुन्ती ने मुझसे कहा—“बेटा! कर्ण को भी जलाञ्जलि देना।” यह सुनकर मुझे ज्ञात हुआ कि महात्मा कर्ण मेरे ही भाई थे। उसी क्षण से उनके लिए मेरे हृदय में भारी शोक बस गया। हे देवो! इस विचार से मैं बार-बार और भी पश्चात्ताप में जलता हूँ कि—जिस महामना, अमितात्मा पुरुष के चरण मैंने अपनी माता कुन्ती के चरणों के समान देखे, फिर भी मैं शत्रुदलमर्दन कर्ण का अनुगामी क्यों न हुआ? यदि कर्ण हमारे साथ होते, तो युद्ध में इन्द्र भी हमें परास्त नहीं कर सकते थे।

Verse 8

दृष्टवैव तौ नानुगतः कर्ण परबलार्दनम्‌ | न हस्मान्‌ कर्णसहितान्‌ जयेच्छक्रोडपि संयुगे,देवताओ! यह सोचकर तो मैं और भी पश्चात्ताप करता रहता हूँ कि “महामना कर्णके दोनों चरणोंको माता कुन्तीके चरणोंके समान देखकर भी मैं क्यों नहीं शत्रुदलमर्दन कर्णका अनुगामी हो गया?” यदि कर्ण हमारे साथ होते तो हमें इन्द्र भी युद्धमें परास्त नहीं कर सकते

युधिष्ठिर बोले—माता कुन्ती के चरणों के समान उन दोनों चरणों को देखकर भी मैं परबलार्दन, शत्रुदलमर्दन कर्ण का अनुगामी क्यों न हुआ? यही विचार मेरे शोक और पश्चात्ताप को और बढ़ा देता है। यदि कर्ण हमारे साथ होते, तो युद्ध में इन्द्र भी हमें जीत नहीं सकते थे।

Verse 9

तमहं यत्र तत्रस्थं द्रष्टमिच्छामि सूर्यजम्‌ । अविज्ञातो मया योडसौ घातित: सव्यसाचिना,ये सूर्यनन्दन कर्ण जहाँ कहीं भी हों मैं उनका दर्शन करना चाहता हूँ; जिन्हें न जाननेके कारण मैंने अर्जुनद्वारा उनका वध करवा दिया

युधिष्ठिर बोले—सूर्यनन्दन कर्ण जहाँ कहीं भी हों, मैं उनका दर्शन करना चाहता हूँ। उन्हें न पहचान पाने के कारण मैंने अर्जुन के हाथों उनका वध करवा दिया।

Verse 10

भीमं च भीमविक्रान्तं प्राणेभ्योडपि प्रियं मम । अर्जुन चेन्द्रसंकाशं यमौ चैव यमोपमौ,मैं अपने प्राणोंसे भी प्रियतम भयंकर पराक्रमी भाई भीमसेनको, इन्द्रतुल्य तेजस्वी अर्जुनको, यमराजके समान अजेय नकुल-सहदेवको तथा धर्मपरायणा देवी द्रौपदीको भी देखना चाहता हूँ। यहाँ रहनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है। मैं आप लोगोंसे यह सच्ची बात कहता हूँ

युधिष्ठिर बोले—मैं अपने प्राणों से भी प्रिय, भयंकर पराक्रमी भीम को; इन्द्र के समान तेजस्वी अर्जुन को; और यमराज के समान अजेय जुड़वाँ भाइयों—नकुल और सहदेव—को देखना चाहता हूँ। साथ ही धर्मपरायणा देवी द्रौपदी का भी दर्शन करना चाहता हूँ। यहाँ रहने की मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है; मैं आप लोगों से यह सत्य कहता हूँ।

Verse 11

द्रष्टमिच्छामि तां चाहं पाञज्चालीं धर्मचारिणीम्‌ । न चेह स्थातुमिच्छामि सत्यमेवं ब्रवीमि व:,मैं अपने प्राणोंसे भी प्रियतम भयंकर पराक्रमी भाई भीमसेनको, इन्द्रतुल्य तेजस्वी अर्जुनको, यमराजके समान अजेय नकुल-सहदेवको तथा धर्मपरायणा देवी द्रौपदीको भी देखना चाहता हूँ। यहाँ रहनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है। मैं आप लोगोंसे यह सच्ची बात कहता हूँ

युधिष्ठिर बोले—मैं उस पाञ्चाली, धर्म का आचरण करने वाली द्रौपदी का दर्शन करना चाहता हूँ। और मैं यहाँ ठहरना नहीं चाहता। यह सत्य मैं आप लोगों से कहता हूँ।

Verse 12

कि मे भ्रातृविहीनस्य स्वर्गेण सुरसत्तमा: । यत्र ते मम स स्वर्गो नायं स्वर्गो मतो मम,सुरश्रेष्रणण! अपने भाइयोंसे अलग रहकर इस स्वर्गसे भी मुझे क्या लेना है? जहाँ मेरे भाई हैं वहीं मेरा स्वर्ग है। उनके बिना मैं इस लोकको स्वर्ग नहीं मानता

युधिष्ठिर बोले—हे देवश्रेष्ठो! भाइयों से वियोग में इस स्वर्ग का मुझे क्या प्रयोजन? जहाँ मेरे भाई हैं वही मेरा स्वर्ग है; उनके बिना मैं इस लोक को स्वर्ग नहीं मानता।

Verse 13

देवा ऊचु यदि वै तत्र ते श्रद्धा गम्यतां पुत्र मा चिरम्‌ । प्रिये हि तव वर्तामो देवराजस्य शासनात्‌,देवता बोले--वत्स! यदि उन लोगोंमें तुम्हारी श्रद्धा है तो चलो, विलम्ब न करो। हम लोग देवराजकी आज्ञासे सर्वथा तुम्हारा प्रिय करना चाहते हैं

देवताओं ने कहा—वत्स! यदि तुम्हारी श्रद्धा उन्हीं में है, तो चलो; विलम्ब मत करो। देवराज की आज्ञा से हम तुम्हारे प्रिय के लिए ही प्रवृत्त हैं।

Verse 14

वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा त॑ ततो देवा देवदूतमुपादिशन्‌ । युधिष्ठटिरस्य सुहृदो दर्शयेति परंतप,वैशम्पायनजी कहते हैं--शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर देवताओंने देवदूतको आज्ञा दी--'तुम युधिष्ठिरको इनके सुहृदोंका दर्शन कराओ'

वैशम्पायन बोले—परंतप जनमेजय! ऐसा कहकर देवताओं ने देवदूत को आज्ञा दी—“युधिष्ठिर को उसके सुहृदों का दर्शन कराओ।”

Verse 15

ततः कुन्तीसुतो राजा देवदूतश्न जग्मतुः । सहितौ राजशार्दूल यत्र ते पुरुषर्षभा:,नृपश्रेष्ठ! तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर और देवदूत दोनों साथ-साथ उस स्थानकी ओर चले जहाँ वे पुरुषप्रवर भीमसेन आदि थे

तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर देवदूत के साथ-साथ उस स्थान की ओर चले, हे राजशार्दूल! जहाँ वे पुरुषश्रेष्ठ—भीमसेन आदि—थे।

Verse 16

अग्रतो देवदूतश्न ययौ राजा च पृष्ठतः । पन्थानमशुभं दुर्ग सेवितं पापकर्मभि:,आगे-आगे देवदूत जा रहा था और पीछे-पीछे राजा युधिष्छिर। दोनों ऐसे दुर्गम मार्गपर जा पहुँचे जो बहुत ही अशुभ था। पापाचारी मनुष्य ही यातना भोगनेके लिये उसपर आते- जाते थे

वैशम्पायन बोले—आगे-आगे देवदूत चला और पीछे-पीछे राजा। वे एक ऐसे अशुभ, दुर्गम मार्ग पर पहुँचे, जिस पर पापकर्मी लोग यातना भोगने के लिए आया-जाया करते थे।

Verse 17

तमसा संवृतं घोरं केशशैवलशाद्वलम्‌ । युक्त पापकृतां गन्धैर्मासशोणितकर्दमम्‌,वहाँ घोर अन्धकार छा रहा था। केश, सेवार और घास इन्हींसे वह मार्ग भरा हुआ था। वह पापियोंके ही योग्य था। वहाँ दुर्गन्ध फैल रही थी। मांस और रक्तकी कीच जमी हुई थी

Vaiśampāyana said: The path was shrouded in dreadful darkness, strewn with hair, slime-like growth, and grass. It was fit only for evildoers, reeking with foul odors, and caked with mire of flesh and blood—an image of moral ruin made visible as a landscape.

Verse 18

दंशोत्पातकभल्लूकमक्षिकामशकावृतम्‌ । इतश्रेतश्व कुणपै: समन्तात्‌ परिवारितम्‌,उस रास्तेपर डाँस, मच्छर, मक्खी, उत्पाती जीवजन्तु और भालू आदि फैले हुए थे। इधर-उधर सब ओर सड़े मुर्दे पड़े हुए थे

Vaiśampāyana said: The path was covered with gadflies and other stinging pests, with ominous creatures and bears; it was swarmed by flies and mosquitoes. Here and there, on every side, it was hemmed in by rotting corpses—an image of the moral wreckage left by violence, confronting the travelers with the grim aftermath of adharma and the impermanence of embodied life.

Verse 19

अस्थिकेशसमाकीर्ण कृमिकीटसमाकुलम्‌ । ज्वलनेन प्रदीप्तेन समन्तात्‌ परिवेष्टितम्‌,हड्डियाँ और केश चारों ओर फैले हुए थे। कृमि और कीटोंसे वह मार्ग भरा हुआ था। उसे चारों ओरसे जलती आगने घेर रखा था

Vaiśampāyana said: The path was strewn everywhere with bones and hair, swarming with worms and insects, and on all sides it was encircled by blazing fire—an image of the dreadful consequences that attend the soul’s passage when it confronts the residues of violence and suffering.

Verse 20

अयोमुखैश्न काकाद्यर्गुप्रैश्ष समभिद्रुतम्‌ । सूचीमुखैस्तथा प्रेतैर्विन्ध्यशैलोपमैर्वृतम्‌,लोहेकी-सी चोंचवाले कौए और गीध आदि पक्षी मँडरा रहे थे। सूईके समान चुभते हुए मुखोंवाले और विन्ध्यपर्ववके समान विशालकाय प्रेत वहाँ सब ओर घूम रहे थे

Vaiśampāyana said: That place was swarmed by iron-beaked birds—crows and the like, and vultures. It was also surrounded by spirits with needle-like, piercing mouths, huge as the Vindhya mountains, roaming on every side—an image of the grim consequences that follow violence and moral collapse.

Verse 21

मेदोरुधिरयुक्तैश्व च्छिन्ननाहूरुपाणिभि: । निकृत्तोदरपादैश्व तत्र तत्र प्रवेरिते:

Verse 22

वहाँ यत्र-तत्र बहुत-से मुर्दे बिखरे पड़े थे, उनमेंसे किसीके शरीरसे रुधिर और मेद बहते थे, किसीके बाहु, ऊरु, पेट और हाथ-पैर कट गये थे ।। स तत्कुणपतदुर्गन्धमशिवं लोमहर्षणम्‌ । जगाम राजा धर्मात्मा मध्ये बहु विचिन्तयन्‌,धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन बहुत चिन्ता करते हुए उसी मार्गके बीचसे होकर निकले जहाँ सड़े मुदोंकी बदबू फैल रही थी और अमंगलकारी बीभत्स दृश्य दिखायी देता था। वह भयंकर मार्ग रोंगटे खड़े कर देनेवाला था

वैशम्पायन बोले—धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर उसी मार्ग के बीच से आगे बढ़े, जहाँ सड़े हुए शवों की दुर्गन्ध फैल रही थी, दृश्य अमंगलकारी और रोंगटे खड़े कर देने वाला था। वे मन-ही-मन बहुत-से विचारों में डूबे हुए, उस भीषण पथ से होकर चले।

Verse 23

ददर्शोष्णोदकै: पूर्णा नदीं चापि सुदुर्गमाम्‌ । असिपत्रवनं चैव निशितं क्षुरसंवृतम्‌,आगे जाकर उन्होंने देखा, खौलते हुए पानीसे भरी हुई एक नदी बह रही है, जिसके पार जाना बहुत ही कठिन है। दूसरी ओर तीखी तलवारों या छूरोंके-से पत्तोंसे परिपूर्ण तेज धारवाला असिपत्र नामक वन है

वैशम्पायन बोले—आगे उन्होंने खौलते जल से भरी एक नदी देखी, जिसे पार करना अत्यन्त कठिन था; और दूसरी ओर असिपत्रवन भी देखा, जो तीक्ष्ण था और उस्तरे-सी धार वाले पत्तों से घिरा हुआ था।

Verse 24

करम्भवालुकास्तप्ता आयसीश्व शिला:पृथक्‌ । लोहकुम्भी श्व॒ तैलस्य क्वाथ्यमाना: समन्ततः,कहीं गरम-गरम बालू बिछी है तो कहीं तपाये हुए लोहेकी बड़ी-बड़ी चट्टानें रखी गयी हैं। चारों ओर लोहेके कलशोंमें तेल खौलाया जा रहा है

वैशम्पायन बोले—कहीं करम्भ मिली बालू तप्त होकर बिछी थी, कहीं अलग-अलग तपायी हुई लोहे की शिलाएँ थीं; और चारों ओर लोहे के कलशों में तेल उबाला जा रहा था।

Verse 25

कूटशाल्मलिकं चापि दुःस्पर्श तीक्ष्णकण्टकम्‌ । ददर्श चापि कौन्तेयो यातना: पापकर्मिणाम्‌,जहाँ-तहाँ पैने काँटोंसे भरे हुए सेमलके वृक्ष हैं, जिनको हाथसे छूना भी कठिन है। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने यह भी देखा कि वहाँ पापाचारी जीवोंको बड़ी कठोर यातनाएँ दी जा रही हैं

वैशम्पायन बोले—कुन्तीनन्दन ने कूट-शाल्मलि वृक्ष भी देखे, जो छूने में कठिन और तीखे काँटों से भरे थे; और उन्होंने वहाँ पापकर्मियों को दी जा रही कठोर यातनाएँ भी देखीं।

Verse 26

देवदूतका युधिष्ठिरको मायामय नरकका दर्शन कराना स तं दुर्गन्धमालक्ष्य देवदूतमुवाच ह । कियदध्वानमस्माभिर्गन्तव्यमिममीदृशम्‌,वहाँकी दुर्गन्धका अनुभव करके उन्होंने देवदूतसे पूछा--“भैया! ऐसे रास्तेपर अभी हमलोगोंको कितनी दूर और चलना है? तथा मेरे वे भाई कहाँ हैं? यह तुम्हें मुझे बता देना चाहिये। देवताओंका यह कौन-सा देश है, इस बातको मैं जानना चाहता हूँ”

वैशम्पायन बोले—उस दुर्गन्ध को अनुभव करके युधिष्ठिर ने देवदूत से कहा—“भैया! ऐसे ही मार्ग पर हमें और कितनी दूर जाना है? और मेरे भाई कहाँ हैं? यह तुम मुझे बताओ। यह देवताओं का कौन-सा देश है? मैं इसे जानना चाहता हूँ।”

Verse 27

क्व च ते भ्रातरो महां तन्ममाख्यातुमर्हसि । देशो<यं कश्न देवानामेतदिच्छामि वेदितुम्‌,वहाँकी दुर्गन्धका अनुभव करके उन्होंने देवदूतसे पूछा--“भैया! ऐसे रास्तेपर अभी हमलोगोंको कितनी दूर और चलना है? तथा मेरे वे भाई कहाँ हैं? यह तुम्हें मुझे बता देना चाहिये। देवताओंका यह कौन-सा देश है, इस बातको मैं जानना चाहता हूँ”

“भैया! ऐसे मार्ग पर अब हमें और कितनी दूर चलना है? और मेरे वे भाई कहाँ हैं? यह तुम मुझे अवश्य बताओ। देवताओं का यह कौन-सा देश है—यह भी मैं जानना चाहता हूँ।”

Verse 28

स संनिववृते श्रुत्वा धर्मराजस्य भाषितम्‌ | देवदूतो<ब्रवीच्चैनमेतावद्‌ गमनं तव,धर्मराजकी यह बात सुनकर देवदूत लौट पड़ा और बोला--“बस, यहींतक आपको आना था

धर्मराज की यह बात सुनकर देवदूत लौट पड़ा और उनसे बोला—“बस, आपका गमन यहीं तक है।”

Verse 29

निवर्तितव्यो हि मया तथास्म्युक्तो दिवौकसै: | यदि श्रान्तो$सि राजेन्द्र त्वमथागन्तुमरहसि,“महाराज! देवताओंने मुझसे कहा है कि जब युधिष्ठिर थक जायेँ तब उन्हें वापस लौटा लाना; अतः अब मुझे आपको लौटा ले चलना है। यदि आप थक गये हों तो मेरे साथ आइये”

“महाराज! देवताओं ने मुझसे कहा है कि जब युधिष्ठिर थक जाएँ, तब उन्हें वापस लौटा लाना। इसलिए अब मुझे आपको लौटाकर ले जाना है। यदि आप थक गए हों, राजेन्द्र, तो मेरे साथ आइए।”

Verse 30

युधिष्ठिरस्तु निर्विण्णस्तेन गन्धेन मूर्च्छित: । निवर्तने धृतमना: पर्यावर्तत भारत,भरतनन्दन! युधिष्ठिर वहाँकी दुर्गन्‍न्धसे घबरा गये थे। उन्हें मूर्च्छा-सी आने लगी थी। इसलिये उन्होंने मनमें लौट जानेका ही निश्चय किया और उस निश्चयके अनुसार वे लौट पड़े

भरतनन्दन! उस दुर्गन्ध से युधिष्ठिर घबरा गए; उन्हें मूर्च्छा-सी आने लगी। इसलिए उन्होंने मन में लौट जाने का निश्चय किया और उसी निश्चय के अनुसार वे लौट पड़े।

Verse 31

स संनिवृत्तो धर्मात्मा दुःखशोकसमाहत: । शुश्राव तत्र वदतां दीना वाच: समन्ततः,दुःख और शोकसे पीड़ित हुए धर्मात्मा युधिष्ठिर ज्यों ही वहाँसे लौटने लगे त्यों ही उन्हें चारों ओरसे पुकारनेवाले आर्त मनुष्योंकी दीन वाणी सुनायी पड़ी--

दुःख और शोक से पीड़ित धर्मात्मा युधिष्ठिर जैसे ही लौटने लगे, वैसे ही वहाँ उन्हें चारों ओर से पुकारते हुए दुःखी जनों की दीन वाणी सुनाई पड़ी।

Verse 32

भो भो धर्मज राजर्षे पुण्याभिजन पाण्डव | अनुग्रहार्थमस्माकं तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम्‌,हे धर्मनन्दन! हे राजर्षे! हे पवित्र कुलमें उत्पन्न पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर| आप हमलोगोंपर कृपा करनेके लिये दो घड़ीतक यहीं ठहरिये

वैशम्पायन बोले— हे धर्मराज! हे राजर्षे! हे पुण्यशील कुल में उत्पन्न पाण्डव! हम पर अनुग्रह करने के लिए आप थोड़ी देर—एक मुहूर्त—यहीं ठहरिए।

Verse 33

आयाति वत्वयि दुर्धर्षे वाति पुण्य: समीरण: । तव गन्धानुगस्तात येनास्मान्‌ सुखमागमत्‌,“आप दुर्धर्ष महापुरुषके आते ही परम पवित्र हवा चलने लगी है। तात! वह हवा आपके शरीरकी सुगन्ध लेकर आ रही है जिससे हमलोगोंको बड़ा सुख मिला है

वैशम्पायन बोले— हे दुर्धर्ष! आपके आते ही परम पवित्र पवन बहने लगा है। तात! वह आपके शरीर की सुगन्ध लेकर आता है, जिससे हमें सुख और शान्ति मिली है।

Verse 34

ते वयं पार्थ दीर्घस्य कालस्य पुरुषर्षभ । सुखमासादयिष्यामस्त्वां दृष्टवा राजसत्तम,'पुरुषप्रवर! कुन्तीकुमार! नृपश्रेष्ठ) आज दीर्घकालके पश्चात्‌ आपका दर्शन पाकर हम सुखका अनुभव करेंगे

वैशम्पायन बोले— हे पार्थ! हे पुरुषश्रेष्ठ! हे राजोत्तम! दीर्घ काल के बाद आज आपका दर्शन करके हम सुख प्राप्त करेंगे।

Verse 35

संतिष्ठस्व महाबाहो मुहूर्तमपि भारत । त्वयि तिष्ठति कौरव्य यातनास्मान्‌ न बाधते,“महाबाहु भरतनन्दन! हो सके तो दो घड़ी भी ठहर जाइये | कुरुनन्दन! आपके रहनेसे यहाँकी यातना हमें कष्ट नहीं दे रही है”

वैशम्पायन बोले— हे महाबाहु भारत! एक मुहूर्त भी ठहर जाइए। हे कौरव्य! आपके यहाँ रहने से इस स्थान की यातना हमें नहीं सताती।

Verse 36

एवं बहुविधा वाच: कृपणा वेदनावताम्‌ । तस्मिन्‌ देशे स शुभ्राव समन्ताद्‌ वदतां नृप,नरेश्वर! इस प्रकार वहाँ कष्ट पानेवाले दुखी प्राणियोंके भाँति-भाँतिके दीन वचन उस प्रदेशमें उन्हें चारों ओरसे सुनायी देने लगे

वैशम्पायन बोले— हे नरेश्वर! इस प्रकार उस प्रदेश में पीड़ा से व्याकुल दीन प्राणियों की अनेक प्रकार की करुण वाणी वह (युधिष्ठिर) चारों ओर से सुनने लगा।

Verse 37

तेषां तु वचन श्रुत्वा दयावान्‌ दीनभाषिणाम्‌ | अहो कृच्छमिति प्राह तस्थौ स च युधिषछिर:,दीनतापूर्ण वचन कहनेवाले उन प्राणियोंकी बातें सुनकर दयालु राजा युधिष्ठिर वहाँ खड़े हो गये। उनके मुँहले सहसा निकल पड़ा--'अहो! इन बेचारोंको बड़ा कष्ट है!

दीनता से भरी वाणी बोलने वाले उन प्राणियों की बातें सुनकर दयालु युधिष्ठिर वहीं ठिठक गए। उनके मुख से सहसा निकल पड़ा—“अहो! कितना कष्ट!”

Verse 38

स ता गिर: पुरस्ताद वै श्रुतपूर्वा पुन: पुन: । ग्लानानां दुःखितानां च नाभ्यजानत पाण्डव:,महान्‌ कष्ट और दु:खमें पड़े हुए प्राणियोंकी वे ही पहलेकी सुनी हुई करुणाजनक बातें सामनेकी ओरसे बारंबार उनके कानोंमें पड़ने लगीं तो भी वे पाण्डुकुमार उन्हें पहचान न सके

महान् कष्ट और दुःख में पड़े हुए प्राणियों की वे ही पहले सुनी हुई करुण वाणियाँ सामने से बार-बार उसके कानों में पड़ती रहीं; तथापि पाण्डव उन्हें पहचान न सका।

Verse 39

अबुध्यमानस्ता वाचो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: । उवाच के भवन्तो वै किमर्थमिह तिष्ठथ,उनकी वे बातें पूर्णएरूपसे न समझकर धर्मपुत्र युधिष्ठिने पूछा--“आपलोग कौन हैं और किसलिये यहाँ रहते हैं?”

उनकी बातें पूरी तरह न समझकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने पूछा—“आप लोग कौन हैं, और किस कारण यहाँ ठहरे हैं?”

Verse 40

इत्युक्तास्ते ततः सर्वे समन्‍्तादवभाषिरे | कर्णो5हं भीमसेनो5हमर्जुनो5हमिति प्रभो,उनके इस प्रकार पूछनेपर वे सब चारों ओरसे बोलने लगे--'प्रभो! मैं कर्ण हूँ। मैं भीमसेन हूँ। मैं अर्जुन हूँ। मैं नकुल हूँ। मैं सहदेव हूँ। मैं धृष्टद्युम्न हूँ। मैं द्रौपदी हूँ और हमलोग द्रौपदीके पुत्र हैं।! इस प्रकार वे सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर अपना-अपना नाम बताने लगे

युधिष्ठिर के ऐसा पूछते ही वे सब चारों ओर से बोल उठे—“प्रभो! मैं कर्ण हूँ, मैं भीमसेन हूँ, मैं अर्जुन हूँ”—इस प्रकार वे अपनी-अपनी पहचान पुकारने लगे।

Verse 41

नकुल: सहदेवोहं धृष्टद्युम्नो5हमित्युत । द्रौपदी द्रौपदेयाश्व इत्येवं ते विचुक्रुशु:ः,उनके इस प्रकार पूछनेपर वे सब चारों ओरसे बोलने लगे--'प्रभो! मैं कर्ण हूँ। मैं भीमसेन हूँ। मैं अर्जुन हूँ। मैं नकुल हूँ। मैं सहदेव हूँ। मैं धृष्टद्युम्न हूँ। मैं द्रौपदी हूँ और हमलोग द्रौपदीके पुत्र हैं।! इस प्रकार वे सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर अपना-अपना नाम बताने लगे

कोई चिल्लाया—“मैं नकुल हूँ”, कोई—“मैं सहदेव हूँ”, और कोई—“मैं धृष्टद्युम्न हूँ”; फिर—“मैं द्रौपदी हूँ” और “हम द्रौपदी के पुत्र हैं”—इस प्रकार वे सब ऊँचे स्वर से पुकारते रहे।

Verse 42

ता वाच: स तदा श्रुत्वा तद्देशसदृशीर्नुप । ततो विममृशे राजा कि त्विदं दैवकारितम्‌,नरेश्वर! उस देशके अनुरूप उन बातोंको सुनकर राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन विचार करने लगे कि दैव-का यह कैसा विधान है

उस देश के अनुरूप वे बातें सुनकर राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन विचार करने लगे—“यह दैव का कैसा विधान है?”

Verse 43

कि तु तत्‌ कलुषं कर्म कृतमेभिमहात्मभि: । कर्णेन द्रौपदेयैर्वा पा्चाल्या वा सुमध्यया,“मेरे इन महामना भाइयोंने, कर्णने, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंने अथवा स्वयं सुमध्यमा द्रौोपदीने भी कौन-सा ऐसा पाप किया था जिससे ये लोग इस दुर्गन्धपूर्ण भयंकर स्थानमें निवास करते हैं। इन समस्त पुण्यात्मा पुरुषोंने कभी कोई पाप किया था, इसे मैं नहीं जानता

पर इन महात्माओं ने—कर्ण ने, द्रौपदी के पुत्रों ने अथवा सुमध्यमा पाञ्चाली द्रौपदी ने—ऐसा कौन-सा कलुषित कर्म किया था कि इन्हें इस दुर्गन्धपूर्ण, भयंकर स्थान में रहना पड़े?

Verse 44

य इमे पापगन्धेडस्मिन्‌ देशे सन्ति सुदारुणे । नाहं जानामि सर्वेषां दुष्कृतं पुण्यकर्मणाम्‌,“मेरे इन महामना भाइयोंने, कर्णने, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंने अथवा स्वयं सुमध्यमा द्रौोपदीने भी कौन-सा ऐसा पाप किया था जिससे ये लोग इस दुर्गन्धपूर्ण भयंकर स्थानमें निवास करते हैं। इन समस्त पुण्यात्मा पुरुषोंने कभी कोई पाप किया था, इसे मैं नहीं जानता

जो ये पुण्यकर्मी जन इस दुर्गन्धयुक्त, अत्यन्त दारुण देश में हैं—इन सबका कोई दुष्कृत मैं नहीं जानता।

Verse 45

कि कृत्वा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो राजा सुयोधन: । तथा श्रिया युत: पापै: सह सर्व: पदानुगै:,“धृतराष्ट्रका पुत्र राजा सुयोधन कौन-सा पुण्यकर्म करके अपने समस्त पापी सेवकोंके साथ वैसी अद्भुत शोभा और सम्पत्तिसे संयुक्त हुआ है?

धृतराष्ट्र का पुत्र राजा सुयोधन कौन-सा पुण्यकर्म करके अपने समस्त पापी अनुचरों सहित ऐसी श्री-सम्पदा से युक्त हुआ है?

Verse 46

महेन्द्र इव लक्ष्मीवानास्ते परमपूजिता: । कस्येदानीं विकारो5यं य इमे नरकं॑ गता:

वह महेन्द्र के समान लक्ष्मीवान होकर परमपूजित बैठा है; और ये लोग नरक को गए हैं—अब यह परिवर्तन किसका है?

Verse 47

“वह तो यहाँ अत्यन्त सम्मानित होकर महेन्द्रके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न हुआ है। इधर यह किस कर्मका फल है कि मेरे सगे-सम्बन्धी नरकमें पड़े हुए हैं? ।। सर्वधर्मविद: शूरा: सत्यागमपरायणा: । क्षत्रधर्मरता: सन्‍्तो यज्वानो भूरिदक्षिणा:,“मेरे भाई सम्पूर्ण धर्मके ज्ञाता, शूरवीर, सत्यवादी तथा शास्त्रके अनुकूल चलनेवाले थे। इन्होंने क्षत्रिय-धर्ममें तत्यर रहकर बड़े-बड़े यज्ञ किये और बहुत-सी दक्षिणाएँ दी हैं (तथापि इनकी ऐसी दुर्गति क्यों हुई)?

वह तो यहाँ अत्यन्त सम्मानित होकर, स्वयं महेन्द्र के समान राजलक्ष्मी से सम्पन्न है। पर यह किस कर्म का फल है कि मेरे अपने सगे-सम्बन्धी नरक में पड़े हैं? मेरे भाई सम्पूर्ण धर्म के ज्ञाता—शूरवीर, सत्यवादी और शास्त्रानुकूल आचरण में तत्पर थे। वे क्षत्रधर्म में स्थिर रहकर बड़े-बड़े यज्ञ करते रहे और बहुत-सी दक्षिणाएँ देते रहे; फिर भी उन पर ऐसी दुर्गति क्यों आ पड़ी?

Verse 48

कि नु सुप्तो5स्मि जागर्मि चेतयामि न चेतये । अहो चित्तविकारो<यं स्याद्‌ वा मे चित्तविभ्रम:,'क्या मैं सोता हूँ या जागता हूँ? मुझे चेत है या नहीं? अहो! यह मेरे चित्तका विकार तो नहीं है, अथवा हो सकता है यह मेरे मनका भ्रम हो”

क्या मैं सो रहा हूँ या जाग रहा हूँ? मुझे चेत है या नहीं? अहो! यह मेरे चित्त का विकार तो नहीं, अथवा मेरे मन का कोई भ्रम तो नहीं?

Verse 49

एवं बहुविधं राजा विममर्श युधिष्ठिर: । दुःखशोकसमाविष्टश्विन्ताव्याकुलितेन्द्रिय:,दुःख और शोकके आवेशसे युक्त हो राजा युधिष्ठिर इस तरह नाना प्रकारसे विचार करने लगे। उस समय उनकी सारी इन्द्रियाँ चिन्तासे व्याकुल हो गयी थीं

इस प्रकार राजा युधिष्ठिर नाना प्रकार से विचार करने लगे। दुःख और शोक से अभिभूत होकर, उनकी इन्द्रियाँ चिन्ता से व्याकुल हो उठीं।

Verse 50

क्रोधमाहारयच्चैव तीव्र धर्मसुतो नृपः । देवांक्ष गर्हयामास धर्म चैव युधिष्ठिर:,धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके मनमें तीव्र रोष जाग उठा। वे देवताओं और धर्मको कोसने लगे

तब धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर के भीतर तीव्र क्रोध उमड़ पड़ा। उसी अवस्था में वे देवताओं को—और धर्म को भी—कोसने लगे।

Verse 51

स तीव्रगन्धसंतप्तो देवदूतमुवाच ह । गम्यतां तत्र येषां त्वं दूतस्तेषामुपान्तिकम्‌,उन्होंने वहाँकी दुःसह दुर्गन्‍न्धसे संतप्त होकर देवदूतसे कहा--“तुम जिनके दूत हो उनके पास लौट जाओ । मैं वहाँ नहीं चलूँगा। यहीं ठहर गया हूँ, अपने मालिकोंको इसकी सूचना दे देना। यहाँ ठहरनेका कारण यह है कि मेरे निकट रहनेसे यहाँ मेरे इन दुखी भाई- बन्धुओंको सुख मिलता है”

वह असह्य दुर्गन्ध से संतप्त होकर देवदूत से बोला—“तुम जिनके दूत हो, उन्हीं के पास लौट जाओ। मैं वहाँ नहीं जाऊँगा; मैं यहीं ठहरूँगा। यह बात अपने स्वामियों से कह देना। क्योंकि मेरे निकट रहने से यहाँ मेरे ये दुखी भाई-बन्धु कुछ सुख पाते हैं।”

Verse 52

न हाहं तत्र यास्यामि स्थितो<5स्मीति निवेद्यताम्‌ | मत्संश्रयादिमे दूता: सुखिनो भ्रातरो हि मे,उन्होंने वहाँकी दुःसह दुर्गन्‍न्धसे संतप्त होकर देवदूतसे कहा--“तुम जिनके दूत हो उनके पास लौट जाओ । मैं वहाँ नहीं चलूँगा। यहीं ठहर गया हूँ, अपने मालिकोंको इसकी सूचना दे देना। यहाँ ठहरनेका कारण यह है कि मेरे निकट रहनेसे यहाँ मेरे इन दुखी भाई- बन्धुओंको सुख मिलता है”

“नहीं—मैं वहाँ नहीं जाऊँगा। यह निवेदन कर देना कि मैं यहीं ठहरने का निश्चय कर चुका हूँ। क्योंकि मेरे आश्रय में आकर ये मेरे दुःखी भाई-बन्धु भी कुछ सुख पाते हैं।”

Verse 53

इत्युक्तः स तदा दूत: पाण्डुपुत्रेण धीमता । जगाम तत्र यत्रास्ते देवराज: शतक्रतु:ः,बुद्धिमान्‌ पाण्डुपुत्रके ऐसा कहनेपर देवदूत उस समय उस स्थानको चला गया जहाँ सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्र विराजमान थे

बुद्धिमान् पाण्डुपुत्र के ऐसा कहने पर वह देवदूत उसी समय वहाँ चला गया जहाँ सौ यज्ञों के कर्ता देवराज इन्द्र विराजमान थे।

Verse 54

निवेदयामास च तद्‌ धर्मराजचिकीर्षितम्‌ | यथोक्तं धर्मपुत्रेण सर्वमेव जनाधिप,नरेश्वर! दूतने वहाँ धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं और यह भी निवेदन कर दिया कि वे क्या करना चाहते हैं

फिर उस दूत ने नरेश्वर के सामने धर्मपुत्र युधिष्ठिर के कहे हुए सब वचन ज्यों-के-त्यों निवेदित किए और यह भी बता दिया कि धर्मराज क्या करने का निश्चय रखते हैं।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira confronts whether he can accept a privileged posthumous state while those he loves and honors appear to suffer; he rejects isolated reward and prioritizes solidarity with the afflicted.

The chapter teaches that dharma is validated by principled compassion even when outcomes appear unjust; ethical commitment is shown by remaining with sufferers rather than pursuing personal comfort.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is narrative-theological—demonstrating that final judgment and karmic sequencing can appear counterintuitive, thereby deepening the epic’s mokṣa-oriented frame.