Adhyaya 1
Svargarohana ParvaAdhyaya 126 Versesयुद्धोत्तर—कुरुक्षेत्र का निर्णय हो चुका; अब फल-भोग और स्वर्ग-न्याय का चरण

Adhyaya 1

स्वर्गे दुर्योधनदर्शनम् | Duryodhana Seen in Heaven (Triviṣṭapa)

Upa-parva: Svargārohaṇa (Heaven-Entry Episode): Yudhiṣṭhira Encounters Duryodhana in Triviṣṭapa

Janamejaya requests an account of the posthumous stations attained by his forebears (Pāṇḍavas and Dhārtarāṣṭras) after reaching svarga. Vaiśaṃpāyana begins by narrating Yudhiṣṭhira’s arrival in triviṣṭapa and his immediate perception of Duryodhana seated in splendor among luminous deities and righteous royal figures. The sight provokes Yudhiṣṭhira’s indignation: he verbally rejects companionship with Duryodhana, recalling the broad devastation attributed to Duryodhana’s choices, the deaths of kin and allies, and Draupadī’s public suffering in the assembly. Yudhiṣṭhira expresses a desire to go where his brothers are rather than remain near Duryodhana. Nārada responds by instructing that in svarga, opposition and enmity do not persist; Duryodhana is honored due to the ‘heroic realm’ attained through kṣatriya-duty in battle. Nārada further advises Yudhiṣṭhira not to dwell on dice-related afflictions and wartime hardships, framing them as concluded within the heavenly order. Yudhiṣṭhira then questions the whereabouts of his brothers and allied warriors (including Karṇa, Dhṛṣṭadyumna, Sātyaki, the Draupadeyas, Śikhaṇḍin, Abhimanyu, Virāṭa, Drupada, and others), signaling the chapter’s transition from moral protest to a structured inquiry about posthumous destinies.

Chapter Arc: जनमेजय, व्यास की आज्ञा से वैशम्पायन स्वर्गारोहण के अद्भुत प्रसंग का द्वार खोलते हैं—युधिष्ठिर और उनके पूर्वज त्रिविष्टप में क्या देखते हैं, यह सुनो। → स्वर्ग में पहुँचकर धर्मराज युधिष्ठिर एक चमकते सूर्य-सम तेजस्वी दृश्य देखते हैं: देवों-साध्यों के बीच दुर्योधन को वीर-लक्ष्मी से विभूषित, उच्च आसन पर। यह दृश्य युधिष्ठिर के भीतर असह्य विरोध और नैतिक प्रश्न जगा देता है—जिसने पृथ्वी का विनाश कराया, वह यहाँ कैसे? → युधिष्ठिर का तीखा प्रतिवाद फूट पड़ता है: यदि दुर्योधन को ‘सनातन’ वीरलोक मिले हैं, तो फिर धर्म-अधर्म का न्याय कहाँ? वे नारद से अपने प्रिय पाण्डव-पक्षीय वीरों—धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदेय, शिखण्डी, अभिमन्यु, विराट-द्रुपद आदि—को दिखाने की माँग करते हैं। → नारद/देवर्षि क्षत्रधर्म का सिद्धान्त सामने रखते हैं: जिन्होंने रण में शरीर की आहुति दी, भय में न डिगे, वे वीरगति के अधिकारी हुए—यही दुर्योधन के स्वर्ग-स्थान का कारण है। पर युधिष्ठिर की तृप्ति नहीं होती; वे अपने जनों को देखे बिना स्वर्ग को स्वीकार नहीं करते। → युधिष्ठिर की दृष्टि अपने प्रिय वीरों को खोजती रह जाती है—वे कहाँ हैं, और स्वर्ग का न्याय किस रूप में प्रकट होगा?

Shlokas

Verse 1

दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये अ प्रहाप्रस्थानिकपर्वकी कुल एलोकसंख्या-- ११४॥। नशा रत (0) आज अत +- ॥| ३० श्रीपरमात्मने नमः ।।

जनमेजय ने कहा—हे मुने! मेरे पूर्वपितामह पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र जब त्रिविष्टप स्वर्गलोक में पहुँचे, तब उन्होंने कौन-कौन से स्थान प्राप्त किए?

Verse 2

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वविच्चासि मे मतः । महर्षिणाभ्यनुज्ञातो व्यासेनादूभुतकर्मणा,मैं यह सब सुनना चाहता हूँ। आप अदभुतकर्मा महर्षि व्यासकी आज्ञा पाकर सर्वज्ञ हो गये हैं--ऐसा मेरा विश्वास है

जनमेजय ने कहा—मैं यह सब सुनना चाहता हूँ। मेरा मत है कि आप सर्वज्ञ हैं, क्योंकि अद्भुतकर्मा महर्षि व्यास की आज्ञा से आप अधिकृत हुए हैं।

Verse 3

वैशग्पायन उवाच स्वर्ग त्रिविष्टपं प्राप्प तव पूर्वपितामहा: । युधिष्ठिरप्रभूतयो यदकुर्वत तच्छूणु

वैशम्पायन बोले—जनमेजय! तीनों लोकों के अन्तर्भाव वाले त्रिविष्टप स्वर्ग में पहुँचकर तुम्हारे पूर्वपितामह युधिष्ठिर आदि ने जो कुछ किया, वह सुनो।

Verse 4

स्वर्ग त्रिविष्टपं प्राप्प धर्मराजो युधिष्ठिर: । दुर्योधन श्रिया जुष्टं ददर्शासीनमासने

त्रिविष्टप स्वर्ग में पहुँचकर धर्मराज युधिष्ठिर ने देखा कि दुर्योधन स्वर्गीय शोभा से युक्त होकर एक दिव्य आसन पर विराजमान है।

Verse 5

भ्राजमानमिवादित्यं वीरलक्ष्म्याभिसंवृतम्‌ । देवैभ्राजिष्णुभि: साध्यै: सहितं पुण्यकर्मभि:

वह सूर्य के समान देदीप्यमान, वीरों की शोभा से आवृत, तेजस्वी देवताओं और पुण्यकर्मा साध्यगणों के साथ दिखाई दे रहा था।

Verse 6

ततो युधिष्छिरो दृष्टवा दुर्योधनममर्षित: । सहसा संनिवृत्तो5भूच्छियं दृष्टवा सुयोधने

तब युधिष्ठिर दुर्योधन को देखकर क्रोध से भर उठे; पर सुयोधन पर स्थित उस समृद्धि को देखकर वे सहसा संयत हो गए।

Verse 7

दुर्योधनको ऐसी अवस्थामें देख उसे मिली हुई शोभा और सम्पत्तिका अवलोकन कर राजा युधिष्ठिर अमर्षसे भर गये और सहसा दूसरी ओर लौट पड़े ।।

दुर्योधन को उस दशा में देखकर और उसे प्राप्त शोभा-सम्पत्ति का अवलोकन कर राजा युधिष्ठिर अमर्ष से भर गए और सहसा दूसरी ओर लौट पड़े। फिर उन सब से ऊँचे स्वर में बोले—“देवगण! लोभी और अदूरदर्शी दुर्योधन के साथ रहकर मैं इन लोकों को पाना नहीं चाहता; उसी के कारण हमने हठपूर्वक युद्ध में अपने समस्त सुहृदों और बन्धुओं का संहार किया और पृथ्वी को उजाड़ डाला; उसी ने पहले हमें महान् वन में भारी क्लेश दिया; और वही हमारी निर्दोष अंगों वाली, धर्मपरायणा पत्नी—पाञ्चाली द्रौपदी—को गुरुजनों के सामने भरी सभा में घसीट लाया था।”

Verse 8

यत्कृते पृथिवी सर्वा सुहृदो बान्धवास्तथा । हतास्माभि: प्रसह्याजौ क्लिष्टै: पूर्व महावने

वैशम्पायन बोले—“जिसके कारण सारी पृथ्वी उजड़ गई और हमारे सुहृद् तथा बन्धु भी युद्ध में हमारे द्वारा बलपूर्वक मारे गए; और जिसके कारण हम पहले महान् वन में घोर क्लेश भोगते रहे—”

Verse 9

फिर उच्चस्वरसे उन सब लोगोंसे बोले--'देवताओ! जिसके कारण हमने अपने समस्त सुहृदों और बन्धुओंका हठपूर्वक युद्धमें संहार कर डाला और सारी पृथ्वी उजाड़ डाली

वैशम्पायन बोले—तब उन्होंने ऊँचे स्वर में उन सब से कहा—“देवगण! जिसके कारण हमने हठपूर्वक युद्ध में अपने समस्त सुहृदों और बन्धुओं का संहार कर डाला और सारी पृथ्वी उजाड़ दी; जिसने पहले महान् वन में हमें घोर क्लेश दिया; और जिसने निर्दोष अंगोंवाली, धर्मपरायणा हमारी पत्नी—पाञ्चालराजकुमारी द्रौपदी—को गुरुजनों के सामने भरी सभा में घसीट लाया; उस लोभी, अदूरदर्शी दुर्योधन के साथ रहकर मैं इन पुण्यलोकों को पाना नहीं चाहता।”

Verse 10

अस्ति देवा न मे काम: सुयोधनमुदीक्षितुम्‌ । तत्राहं गन्तुमिच्छामि यत्र ते भ्रातरो मम,“देवगण! मैं दुर्योधनको देखना भी नहीं चाहता; मेरी तो वहीं जानेकी इच्छा है, जहाँ मेरे भाई हैं!

“देवगण! मुझे सुयोधन (दुर्योधन) को देखने की भी इच्छा नहीं है। मैं तो वहीं जाना चाहता हूँ जहाँ मेरे भाई हैं।”

Verse 11

नैवमित्यब्रवीत्‌ तं तु नारद: प्रहसन्निव । स्वर्गे निवासे राजेन्द्र विरुद्ध चापि नश्यति

वैशम्पायन बोले—यह सुनकर नारदजी हँसते हुए-से बोले—“नहीं-नहीं, ऐसा मत कहो, राजेन्द्र! स्वर्ग में निवास करने पर पूर्व का वैर-विरोध भी नष्ट हो जाता है।”

Verse 12

युधिष्ठिर महाबाहो मैवं वोच: कथंचन । दुर्योधनं प्रति नृपं शृणु चेदं वचो मम,“महाबाहु युधिष्छिर! तुम्हें राजा दुर्योधनके प्रति किसी तरह ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये। मेरी इस बातको ध्यान देकर सुनो

वैशम्पायन बोले—“महाबाहु युधिष्ठिर! राजा दुर्योधन के विषय में किसी प्रकार भी ऐसे वचन मत कहो। मेरी यह बात ध्यान देकर सुनो।”

Verse 13

एष दुर्योधनो राजा पूज्यते त्रिदशै: सह । सद्धिश्व॒ राजप्रवरैर्य इमे स्वर्गवासिन:

वैशम्पायन बोले—देखो, यह राजा दुर्योधन देवताओं के साथ स्वर्ग में पूजित है; और सिद्धों तथा स्वर्ग में निवास करने वाले श्रेष्ठ राजाओं द्वारा भी सम्मानित होता है।

Verse 14

वीरलोकगति): प्राप्ता युद्धे हुत्वा55त्मनस्तनुम्‌ । यूयं सर्वे सुरसमा येन युद्धे समासिता:

वैशम्पायन बोले—उन्होंने युद्ध में अपने शरीर की आहुति देकर वीरों की गति पाई है; क्योंकि वे देवतुल्य तेजस्वी तुम सब भाइयों के विरुद्ध रण में डटकर खड़े रहे। इस प्रकार क्षत्रिय-धर्म के अनुसार युद्ध में प्राण देकर उन्होंने वह पद प्राप्त किया।

Verse 15

स एष क्षत्रधर्मेण स्थानमेतदवाप्तवान्‌ | भये महति यो5भीतो बभूव पृथिवीपति:

वैशम्पायन बोले—यह राजा क्षत्रिय-धर्म के अनुसार इस पद को प्राप्त हुआ है। महान् भय के बीच भी पृथ्वीपति भयभीत न हुआ; निर्भय रहकर उसने यह स्थान जीता है।

Verse 16

न तन्मनसि कर्ताव्यं पुत्र यद्‌ द्यूतकारितम्‌ । द्रौपद्याश्न परिक्लेशं न चिन्तयितुमहसि

वैशम्पायन बोले—पुत्र, जुए के कारण जो अन्याय हुआ, उसे अब मन में न रखना। और द्रौपदी को जो क्लेश पहुँचा, उसका भी चिंतन करना तुम्हें उचित नहीं; उसे विचारों से छोड़ दो।

Verse 17

ये चान्येडपि परिक्लेशा युष्माकं ज्ञातिकारिता: । संग्रामेष्वथ वान्यत्र न तान्‌ संस्मर्तुमहसि

वैशम्पायन बोले—और तुम्हारे स्वजनों के कारण, युद्धों में या अन्यत्र, जो भी अन्य कष्ट तुमने सहे हैं—यहाँ उनका स्मरण करना तुम्हें उचित नहीं।

Verse 18

समागच्छ यथान्यायं राज्ञा दुर्योधनेन वै | स्वर्गोड्यं नेह वैराणि भवन्ति मनुजाधिप,“अब तुम राजा दुर्योधनके साथ न्यायपूर्वक मिलो। नरेश्वर! यह स्वर्गलोक है, यहाँ पहलेके वैर-विरोध नहीं रहते हैं!

वैशम्पायन बोले—“अब तुम राजा दुर्योधन के साथ न्यायानुसार मिलो। नराधिप! यह स्वर्गलोक है; यहाँ पूर्व वैर-विरोध नहीं टिकते।”

Verse 19

नारदेनैवमुक्तस्तु कुरुराजो युधिष्ठिर: । भ्रातृन्‌ पप्रच्छ मेधावी वाक्यमेतदुवाच ह,नारदजीके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान्‌ कुरुराज युधिष्ठिरने अपने भाइयोंका पता पूछा और यह बात कही--

नारद के ऐसा कहने पर बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के विषय में पूछा और यह वचन कहा।

Verse 20

यदि दुर्योधनस्यैते वीरलोका: सनातना: । अधर्मज्ञस्थ पापस्य पृथिवीसुद्ददां द्रुह:

वैशम्पायन बोले—“देवर्षे! यदि अधर्मज्ञ, पापी, समस्त पृथ्वी के सुहृदों से द्रोह करने वाले दुर्योधन को ये सनातन वीरलोक प्राप्त हुए हैं—जिसके कारण घोड़े, हाथी और मनुष्यों सहित पृथ्वी नष्ट हुई—तो फिर मेरे वे वीर, महात्मा, महाव्रतधारी, सत्यप्रतिज्ञ, विश्वविख्यात शूर और सत्यवादी भाई इस समय किन लोकों को प्राप्त हुए हैं? मैं उन्हें देखना चाहता हूँ। और कुन्ती के सत्यप्रतिज्ञ पुत्र महात्मा कर्ण से भी मिलना चाहता हूँ।”

Verse 21

यत्कृते पृथिवी नष्टा सहया सनरद्विपा । वयं च मन्युना दग्धा वैरं प्रतिचिकीर्षव:

“देवर्षे! जिसके कारण घोड़े, हाथी और मनुष्यों सहित पृथ्वी नष्ट हो गयी, और जिसके वैर का प्रतिशोध करने की इच्छा से हम भी क्रोध की आग में जल उठे।”

Verse 22

ये ते वीरा महात्मानो भ्रातरो मे महाव्रता: । सत्यप्रतिज्ञा लोकस्य शूरा वै सत्यवादिन:

“मेरे वे भाई—वीर, महात्मा, महाव्रतधारी—लोक में सत्यप्रतिज्ञ, शूर और सत्यवादी थे।”

Verse 23

तेषामिदानीं के लोका द्रष्टमिच्छामि तानहम्‌ | कर्ण चैव महात्मानं कौन्तेयं सत्यसंगरम्‌

वैशम्पायन बोले—अब मैं यह देखना चाहता हूँ कि उन सबको कौन-से लोक प्राप्त हुए हैं। और मैं कुन्तीपुत्र, सत्य में अडिग तथा संग्राम में अचल, महात्मा कर्ण को भी देखना चाहता हूँ।

Verse 24

धृष्टद्युम्नं सात्यकिं च धृष्टद्युम्नस्य चात्मजान्‌ | येच शस्त्रैर्वधं प्राप्ता: क्षत्रधर्मेण पार्थिवा:

वैशम्पायन बोले—(मैं) धृष्टद्युम्न, सात्यकि और धृष्टद्युम्न के पुत्रों को भी देखना चाहता हूँ; और वे राजा भी, जिन्होंने क्षत्रिय-धर्म के अनुसार शस्त्रों से वध पाया। वे कहाँ हैं? मैं यहाँ उन नरेशों को नहीं देखता। मैं उन सब राजाओं से मिलना चाहता हूँ।

Verse 25

क्व नु ते पार्थिवान्‌ ब्रद्मुन्नैतान्‌ पश्यामि नारद । विराटद्रुपदौ चैव धृष्टकेतुमुखांश्व॒ तान्‌

वैशम्पायन बोले—हे ब्रह्मन्! हे नारद! वे नरेश कहाँ हैं? मैं उन्हें यहाँ नहीं देखता। विराट और द्रुपद तथा धृष्टकेतु आदि वे सब कहाँ हैं?

Verse 26

शिखण्डिनं च पाज्चाल्यं द्रौपदेयांक्ष सर्वश: । अभिमन्यु च दुर्धर्ष द्रष्ठमिच्छामि नारद

वैशम्पायन बोले—हे नारद! मैं पाञ्चाल शिखण्डी को, द्रौपदी के समस्त पुत्रों को और दुर्धर्ष वीर अभिमन्यु को भी देखना चाहता हूँ।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira confronts a dissonance between lived ethical memory (harm, humiliation, and loss attributed to Duryodhana) and the heavenly spectacle of Duryodhana’s honor, raising the problem of how justice is assessed beyond human courts.

The chapter teaches that svarga is characterized by the cessation of hostility and that posthumous standing may reflect role-duty fulfilled (especially kṣatriya conduct in battle), urging restraint from reactivating past grievances in a realm where their oppositional force is dissolved.

No explicit phalaśruti appears in this chapter segment; its meta-function is interpretive, reframing the epic’s moral calculus by distinguishing human grievance from the text’s portrayal of cosmic adjudication and reconciliation.