Gāndhārī’s Battlefield Survey: The Fallen and the Onset of Funeral Rites (शल्य-भगीरथ-भीष्म-द्रोणादि-दर्शनम्)
अहो धिक्पश्य शल्यस्य पूर्णचन्द्रसुदर्शनम् । मुखं पद्मपलाशाक्ष काकैरादष्टमव्रणम्,अहो! धिक्कार है। देखो न, शल्यके पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति दर्शनीय तथा कमलदलके सदृश नेत्रोंवाले त्रणरहित मुखको कौओंने कुछ-कुछ काट दिया है
vaiśampāyana uvāca | aho dhik paśya śalyasya pūrṇacandra-sudarśanam | mukhaṁ padma-palāśākṣa kākair ādaṣṭam avraṇam ||
वैशम्पायन बोले—हाय धिक्कार है! देखो, शल्य का मुख जो पूर्णचन्द्र के समान मनोहर था, कमलदल-से नेत्रों वाला और पहले निरव्रण था—अब कौओं ने उसे जगह-जगह नोचकर फाड़ दिया है।
वैशम्पायन उवाच