संरक्ष्यमाणं भायाभिरनुरक्ताभिरच्युत । भीषयन्त्यो विकर्षन्ति गहनं निम्नमन्तिकात्,अच्युत! इसमें अनुराग रखनेवाली इसकी पत्नियाँ यद्यपि रक्षामें लगी हुई हैं, तथापि गीदड़ियाँ उन्हें डरवाकर जयद्रथकी लाशको उनके निकटसे गहरे गड्ढलेकी ओर खींचे लिये जा रही हैं
अच्युत! इसकी अनुरागिणी पत्नियाँ यद्यपि इसकी रक्षा में लगी हैं, तथापि सियारिनियाँ उन्हें भयभीत करके जयद्रथ की लाश को उनके निकट से घसीटती हुई गहरे गड्ढे की ओर ले जा रही हैं।
वैशम्पायन उवाच