स्त्रीपर्व — अध्याय १५: गान्धारी-युधिष्ठिर-संवादः
Gandhārī’s Confrontation and Consolation of Yudhiṣṭhira
वैशम्पायन उवाच तामुवाचाथ गान्धारी सह वध्वा यशस्विनीम्,असिद्धानुनये कृष्णे यदुवाच महामति: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! गान्धारीने बहू द्रौपदी और यशस्विनी कुन्तीसे कहा--“बेटी! इस प्रकार शोकसे व्याकुल न होओ। देखो, मैं भी तो दुःखमें डूबी हुई हूँ। मैं समझती हूँ, समयके उलट-फेरसे प्रेरित होकर यह सम्पूर्ण जगत्का विनाश हुआ है, जो स्वभावसे ही रोमांचकारी है। यह काण्ड अवश्यम्भावी था, इसीलिये प्राप्त हुआ है। जब संधि करानेके विषयमें श्रीकृष्णकी अनुनय-विनय सफल नहीं हुई, उस समय परम बुद्धिमान् विदुरजीने जो महत्त्वपूर्ण बात कही थी, उसीके अनुसार यह सब कुछ सामने आया है
vaiśampāyana uvāca | tām uvāca atha gāndhārī saha vadhvā yaśasvinīm, asiddhānunaye kṛṣṇe yad uvāca mahāmatiḥ |
वैशम्पायन बोले—तब गान्धारी ने अपनी यशस्विनी बहू के साथ उस स्त्री से कहा—“बेटी, इस प्रकार शोक से व्याकुल मत हो। देखो, मैं भी तो दुःख में डूबी हुई हूँ। मैं मानती हूँ कि काल के उलट-फेर से प्रेरित होकर यह समस्त जगत् का विनाश घटित हुआ है—स्वभाव से ही लोमहर्षक। यह काण्ड अवश्यंभावी था, इसलिए घटा। जब संधि कराने के लिए श्रीकृष्ण की अनुनय-विनय सफल न हुई, तब परम बुद्धिमान विदुर ने जो गंभीर वचन कहा था, उसी के अनुसार यह सब सामने आया।”
वैशम्पायन उवाच