स्त्रीपर्व — अध्याय १५: गान्धारी-युधिष्ठिर-संवादः
Gandhārī’s Confrontation and Consolation of Yudhiṣṭhira
बाष्पमाहारयद् देवी वस्त्रेणावृत्य वै मुखम् । कुन्तीदेवी दीर्घकालके बाद अपने पुत्रोंकी देखकर उनके कष्टोंका स्मरण करके करुणामें डूब गयीं और अंचलसे मुँह ढककर आँसू बहाने लगीं ।। ३३ $ ।। ततो बाष्पं समुत्सृज्य सह पुत्रैस्तदा पृथा
Vaiśampāyana uvāca | bāṣpam āhārayad devī vastreṇāvṛtya vai mukham | tato bāṣpaṃ samutsṛjya saha putrais tadā pṛthā ||
देवी ने वस्त्र से अपना मुख ढककर आँसू बहाए। फिर आँसू छोड़कर पृथा (कुन्ती) उस समय अपने पुत्रों के साथ आगे बढ़ी।
वैशम्पायन उवाच