धृतराष्ट्रस्य उपालम्भः तथा पाण्डव-समाश्वासनम् | Dhṛtarāṣṭra Reproved and the Pāṇḍavas Consoled
किं नु राज्येन ते कार्य पितृन् भ्रातृनपश्यतः । अभिमन्यु च दुर्धर्ष द्रौपदेयांश्व भारत,“भरतवंशी नरेश! अपने ताऊ, चाचा और भाइयोंको, दुर्जय वीर अभिमन्युको तथा द्रौपदीके सभी पुत्रोंको न देखनेपर इस राज्यसे आपका क्या प्रयोजन है?”
kiṁ nu rājyena te kāryaṁ pitṝn bhrātṝn apaśyataḥ | abhimanyuṁ ca durdharṣaṁ draupadeyāṁś ca bhārata ||
वैशम्पायन बोले— “भरतवंशी! जब तुम अपने ताऊ-चाचा और भाइयों को, दुर्धर्ष अभिमन्यु को, तथा द्रौपदी के समस्त पुत्रों को अब नहीं देखते, तब इस राज्य से तुम्हें क्या प्रयोजन?”
वैशम्पायन उवाच