स्त्रीपर्व १: धृतराष्ट्रशोकः संजयाश्वासनं च
Strī Parva 1: Dhṛtarāṣṭra’s Lament and Saṃjaya’s Consolation
त्वयैव ससुतेनायं वाक्यवायुसमीरित: । लोभाज्येन च संसिक्तो ज्वलित: पार्थपावक:,“पुत्रसहित आपने ही अपने लोभरूपी घीसे सींचकर और वचनरूपी वायुसे प्रेरित करके पार्थरूपी अग्निको प्रज्वलित किया था
tvayaiva sasutenāyaṃ vākyavāyusamīritaḥ | lobhājyena ca saṃsikto jvalitaḥ pārthapāvakaḥ ||
आपने ही—पुत्र सहित—वचनरूपी वायु से प्रेरित करके और लोभरूपी घी से सींचकर इस पार्थरूपी अग्नि को प्रज्वलित किया था।
वैशमग्पायन उवाच