ऋत्विग्धर्मः, दक्षिणा-न्यायः, तपसः परमार्थः
Ritvij-Dharma, the Norm of Dakṣiṇā, and the Higher Meaning of Tapas
यस्मिन्नेतानि दृश्यन्ते स पुरोहित उच्यते । जिनमें क्रूरताका सर्वथा अभाव है
जिनमें क्रूरता का सर्वथा अभाव हो, जो सत्यभाषी और सरल हों, जो व्याज न लेते हों तथा जिनमें द्रोह और अभिमान न हो; जिनमें लज्जा, सहनशीलता, इन्द्रिय- संयम और मनोनिग्रह आदि गुण दिखाई दें—वे ही पुरोहित कहलाते हैं।
भीष्म उवाच