ऋत्विग्धर्मः, दक्षिणा-न्यायः, तपसः परमार्थः
Ritvij-Dharma, the Norm of Dakṣiṇā, and the Higher Meaning of Tapas
तेन क्रीतेन यज्ञेन ततो यज्ञ: प्रतायते । इत्येवं धर्मतो ध्यातमृषिभिर्थर्मचारिभि:
दक्षिणा द्वारा उस सोमरस के साथ खरीदे गए यज्ञ-साधनों से यजमान के यज्ञ का विस्तार होता है। धर्म का आचरण करने वाले ऋषियों ने इस विषय में धर्मानुसार यही विचार किया है।
भीष्म उवाच