Yudhiṣṭhira’s Lament for Karṇa and Renunciation-Oriented Self-Assessment (शोक-प्रलापः / त्याग-प्रवृत्तिः)
त्रैलोक्यस्यापि राज्येन नास्मान् वक्ित् प्रहर्षयेत् । बान्धवान् निहतान् दृष्टवा पृथिव्यां विजयैषिण:
जब हमने पृथ्वी पर विजय की इच्छा रखनेवाले अपने बन्धु-बान्धवों को मारा गया देख लिया, तब हमें इस समय तीनों लोकों का राज्य देकर भी कोई प्रसन्न नहीं कर सकता।
युधिछिर उवाच