राजधर्मप्रश्नः — Yudhiṣṭhira’s Inquiry into Rājadharma (Śānti-parva 56)
अद्भयोउन्नि््रह्यृत: क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् । तेषां सर्वत्रगं तेज: स्वासु योनिषु शाम्यति
adbhyo 'nniḥṛtaḥ kṣatram aśmano loham utthitam | teṣāṁ sarvatragaṁ tejaḥ svāsu yoniṣu śāmyati ||
जल से क्षात्र-तेज (राजशक्ति) प्रकट होता है और पत्थर से लोहा उत्पन्न होता है। पर इनका जो तेज सर्वत्र व्याप्त-सा प्रतीत होता है, वह अपनी-अपनी योनि—अपने ही मूल कारण में—अन्ततः शान्त हो जाता है।
भीष्म उवाच