नाग उवाच अभिमानैर्न मानो मे जातिदोषेण वै महान् । रोष: संकल्पज: साध्वि दग्धो वागग्निना त्वया
नाग ने कहा—साध्वी! मुझमें अहंकारजन्य अभिमान नहीं है; किंतु जाति-दोष के कारण महान् रोष भरा हुआ था। मेरे उस संकल्पजनित रोष को तुमने अपनी वाणी-रूपी अग्नि से जला कर भस्म कर दिया।
नाग उवाच