Prāyaścitta-vidhāna: Tapas, Dāna, Vrata, and Proportional Expiation (प्रायश्चित्तविधानम्)
निर्मन्त्रो निर्व॒तों यः स्थादशास्त्रज्ञो3नसूयक: । अनुक्रोशात् प्रदातव्यं हीनेष्वव्रतिकेषु च
जो ब्राह्मण वेद-मन्त्रों से रहित, संतुष्ट, शास्त्र-ज्ञान से शून्य होकर भी दूसरों में दोष न देखे—और जो व्रतहीन, दीन-हीन हो—उन पर दया करके दान देना चाहिए।
व्यास उवाच