Prāyaścitta-vidhāna: Tapas, Dāna, Vrata, and Proportional Expiation (प्रायश्चित्तविधानम्)
ऊर्ध्व भवति संदेहादिह दृष्टार्थमेव च । अपेक्षापूर्वकरणात् प्रायश्षित्तं विधीयते
प्राणों के विषय में संदेह न रहने की स्थिति में, अथवा यहाँ किसी प्रत्यक्ष लाभ के लिए जो कर्म अशुभ बन जाता है—उसे जान-बूझकर (अपेक्षा-पूर्वक) करने के कारण, उसके दोष-निवारण हेतु प्रायश्चित्त का विधान किया गया है।
व्यास उवाच