अध्याय ३५१ — उञ्छवृत्ति-व्रतसिद्धेः मानुषस्य परमगतिः
Sūrya–Nāga Dialogue on the Perfected Gleaner-Ascetic
किमेतान्येकनिष्ठानि पृथड्निष्ठानि वा मुने । प्रत्रूहि वै मया पृष्ट: प्रवृत्ति च यथाक्रमम्
मुने! क्या ये सब एक ही लक्ष्य का बोध कराने वाले हैं, अथवा पृथक्-पृथक् लक्ष्यों का प्रतिपादन करते हैं? मैंने जो पूछा है, उसका यथावत् उत्तर दीजिए और प्रवृत्ति का भी क्रमशः वर्णन कीजिए।
जनमेजय उवाच