धर्मस्य बहुद्वारत्वम् — Nārada’s Audience with Indra (Śānti-parva 340)
प्रादुर्भावगतश्चाहं सुरकार्येषु नित्यदा । अनुशास्यस्त्वया ब्रह्मन् नियोज्यश्व सुतो यथा
और हे ब्रह्मन्! जब-जब मैं देवकार्य सिद्ध करने हेतु प्रकट होऊँ, तब-तब तुम सदा मुझे अनुशासित करना और पुत्र की भाँति प्रत्येक कार्य में नियुक्त करना।
भीष्म उवाच