धर्मस्य बहुद्वारत्वम् — Nārada’s Audience with Indra (Śānti-parva 340)
उत्पन्न एव भवति शरीर चेष्टयन् प्रभु: । न विना धातुसंघातं शरीरं भवति क्वचित्
उसका शरीर में प्रवेश ही ‘उत्पन्न होना’ कहा जाता है। वही प्रभु शरीर को चेष्टाशील बनाता और उसका संचालन करता है। पाँचों भूतों के संघात के बिना कहीं भी शरीर नहीं होता।
भीष्म उवाच