Adhyāya 33 — Yudhiṣṭhira’s Post-Conflict Remorse and Inquiry on Āśrama Discipline (शोक-विमर्शः, आश्रम-जिज्ञासा)
व्यलीकमपि यतृ त्वत्र चित्तवैतंसिकं तव । तदर्थमिष्यते राजन प्रायश्षित्तं तदाचर
राजन्! यहाँ तुम्हारे चित्त में जो व्यर्थ ही झूठी चिंता और पीड़ा उठ रही है, उसकी निवृत्ति के लिए प्रायश्चित्त करना उचित है; अतः तुम प्रायश्चित्त करो।
व्यास उवाच