Nārada’s Darśana of Viśvarūpa Nārāyaṇa and the Caturmūrti Doctrine (नारदस्य नारायणदर्शनं चतुर्मूर्तिविचारश्च)
ज्योतिरात्मनि नान्यत्र सर्वजन्तुषु तत् समम् । स्वयं च शक््यते द्रष्टं सुसमाहितचेतसा
आत्मज्योति का प्रकाश अपने भीतर ही है, बाहर कहीं नहीं। वही ज्योति समस्त प्राणियों में समान रूप से स्थित है। जो चित्त को भली-भाँति एकाग्र कर लेता है, वह उसे स्वयं देख सकता है।
जनक उवाच