Nārada’s Darśana of Viśvarūpa Nārāyaṇa and the Caturmūrti Doctrine (नारदस्य नारायणदर्शनं चतुर्मूर्तिविचारश्च)
भावितै: करणैश्वायं बहुसंसारयोनिषु । आसादयति शुद्धात्मा मोक्ष वै प्रथमाश्रमे
जनक ने कहा—अनेक जन्मों में साधना-कर्म करते-करते जब इन्द्रियाँ संस्कारित और पवित्र हो जाती हैं, तब शुद्ध अन्तःकरण वाला पुरुष प्रथम आश्रम—अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम—में ही मोक्षरूप ज्ञान को प्राप्त कर सकता है।
जनक उवाच