Adhyāya 325: Nārada in Śvetadvīpa—Stotra to the Nirguṇa Mahātman
तथैव च शुकस्तत्र निर्मन्यु: समतिष्ठत । न चातपाध्वसंतप्त: क्षुत्पिपासाश्रमान्वित:
उसी प्रकार शुकदेवजी वहाँ निर्विकार, निरमन्यु होकर खड़े रहे। मार्ग की थकावट और सूर्य की धूप से वे तनिक भी संतप्त न हुए; भूख-प्यास भी उन्हें कष्ट न दे सकी।
भीष्म उवाच