Śuka’s Guṇa-Transcendence and Vyāsa’s Consolation (शुकगति-वर्णनम्)
सौकुमार्य तथा रूपं वपुरग्म्रं तथा वयः । तवैतानि समस्तानि नियमश्षेति संशय:
कोमलता, सौन्दर्य, मनोहर देह और यौवन—ये सब तो योग-नियम के विरुद्ध जान पड़ते हैं। फिर भी तुम्हारे भीतर इन सबके साथ योग और नियम की सिद्धि कैसे है? यही मेरे मन का संदेह है।
जनक उवाच