Adhyaya 319
Shanti ParvaAdhyaya 31917 Verses

Adhyaya 319

शुकस्य योगसिद्धिः (Śuka’s Yogic Attainment and Ascent)

Upa-parva: Mokṣa-dharma (Liberation Teachings) — Śuka’s Yogic Ascent Episode

Bhīṣma describes Śuka ascending a mountain and seating himself in a secluded, level place. He stabilizes the body progressively from the feet upward, faces east near sunrise, and enters a disciplined seated posture. In that silence—absent bird-flocks, sound, and ordinary visibility—Śuka perceives his self as released from all attachments and briefly expresses a spontaneous joy while gazing at the sun. Re-entering yogic absorption to discern the path of liberation, he attains a state described as ‘great lord of yoga’ and traverses the sky. He respectfully circumambulates and reports his yogic state to the devarṣi Nārada, declaring that the path has been seen and that, by Nārada’s favor, he will reach the desired goal. Authorized, Śuka resumes yoga and moves through the atmosphere, rising from Kailāsa and proceeding with resolve. Beings across realms observe and honor him with offerings; celestial groups express astonishment at an ascetic moving like a luminary. Hearing remarks about his filial devotion, Śuka surveys the directions, earth, mountains, forests, waters, and then requests a coordinated response: if Vyāsa follows calling “Śuka,” all directions and features of the world should answer back—an instruction they accept, indicating a narrative mechanism for managing separation between father and son while maintaining reverence.

Chapter Arc: युधिष्ठिर के मन में एक तीखा प्रश्न उठता है—क्या तप, कर्म, श्रुति या रसायन-प्रयोग से जरा और मृत्यु को लांघा जा सकता है? भीष्म इस जिज्ञासा को एक प्राचीन संवाद की ओर मोड़ते हैं। → भीष्म जनक और संन्यासी पंचशिख के संवाद का आरम्भ करते हैं। जनक, धर्म-अर्थ के संशयों को काटने वाले महर्षि से पूछते हैं कि देह-धर्म, निवृत्ति-प्रवृत्ति, और जीवन के अंतिम सत्य के सामने मनुष्य का आश्रय क्या है—जब जरा-मृत्यु सबको ग्रसती है। → पंचशिख निर्णायक वाणी में स्थापित करते हैं कि जरा और मृत्यु ‘महाग्राह’ की तरह बलवान-दुर्बल, छोटे-बड़े सभी को पकड़ते हैं; कोई भी साधन उन्हें स्थायी रूप से नहीं रोक सकता। स्वर्ग-नरक का ‘द्रष्टा’ भी कर्मकर्ता स्वयं है—दूसरा कोई नहीं; न कोई किसी का है, न कोई किसी का स्वामी—आत्मा अपने कर्म-फल का अकेला भोक्ता है। → संवाद का निष्कर्ष यह बनता है कि बाह्य उपाय (तप, कर्मकाण्ड, औषध/रसायन) देह की सीमा के भीतर ही हैं; वास्तविक ‘उल्लंघन’ देह को अमर करना नहीं, बल्कि आसक्ति-भ्रम का क्षय और आत्म-ज्ञान की ओर निवृत्ति है। जनक का संशय शांत होता है—कर्तृत्व-अहंकार और पराश्रय की कल्पना ढहती है, और धर्म का सार अंतर्मुखी विवेक में प्रतिष्ठित होता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ११३ श्लोक हैं) ऑपन--माजल बछ। अकाल एकोनविशर्त्याधिकॉत्रेशततमो< ध्याय: जरा-मृत्युका उल्लंघन करनेके विषयमें पजचशिख और राजा जनकका संवाद युधिछिर उवाच ऐश्वर्य वा महत्‌ प्राप्प धनं वा भरतर्षभ । दीर्घमायुरवाप्याथ कथं मृत्युमतिक्रमेत्‌

युधिष्ठिर ने पूछा—हे भरतश्रेष्ठ! महान् ऐश्वर्य, प्रचुर धन अथवा दीर्घायु प्राप्त करके भी मनुष्य मृत्यु का अतिक्रमण कैसे कर सकता है?

Verse 2

तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन वा । रसायनप्रयोगैर्वा कैर्नाप्रोति जरान्तकौ

क्या घोर तपस्या करके, महान् कर्मों का अनुष्ठान करके, वेद-शास्त्रों का श्रवण-अध्ययन करके अथवा नाना प्रकार के रसायनों का प्रयोग करके—किन उपायों से जरा और मृत्यु को प्राप्त नहीं हुआ जाता?

Verse 3

भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । भिक्षो: पजचशिखस्येह संवादं जनकस्य च

भीष्मजी ने कहा—युधिष्ठिर! इस विषय में विद्वान् लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं—यहीं भिक्षु पंचशिख और राजा जनक के संवाद का।

Verse 4

वैदेहो जनको राजा महर्षि वेदवित्तमम्‌ । पर्यपृच्छत्‌ पञज्चशिखं छिन्नधर्मार्थसंशयम्‌

भीष्म बोले—विदेह के राजा जनक ने वेद-विद्या के परम तत्त्व को जानने की इच्छा से, धर्म और अर्थ-विषयक संशयों से रहित महर्षि पंचशिख से प्रश्न किया, जिससे सदाचार और सत्प्रयोजन का निश्चय हो सके।

Verse 5

एक समयकी बात है, विदेहदेशके राजा जनकने वेद-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षि पंचशिखसे, जिनके धर्म और अर्थ-विषयक संदेह नष्ट हो गये थे, इस प्रकार प्रश्न किया-- ।।

भीष्म बोले—एक समय विदेह के राजा जनक ने वेद-वेत्ताओं में श्रेष्ठ, जिनके धर्म और अर्थ-विषयक संदेह नष्ट हो चुके थे, उस महर्षि पंचशिख से इस प्रकार पूछा—“भगवन्! किस वृत्ति (आचार) से मनुष्य जरा और मृत्यु को लाँघ सकता है? तप से, बुद्धि से, कर्म से, अथवा श्रुति-शास्त्र के ज्ञान से?”

Verse 6

एवमुक्त: स वैदेहं प्रत्युवाचापरोक्षवित्‌ । निवृत्तिर्न तयोरस्ति नानिवृत्ति: कथठ्चन

इस प्रकार कहे जाने पर अपरोक्ष ज्ञान से सम्पन्न महर्षि पंचशिख ने विदेह-राज से उत्तर दिया—“जरा और मृत्यु की पूर्ण निवृत्ति नहीं है; पर यह भी नहीं कि किसी प्रकार उनकी निवृत्ति हो ही नहीं सकती। धन-ऐश्वर्य से वे नहीं टलतीं; पर ज्ञान से पुनर्जन्म का चक्र ही निवृत्त हो जाता है—फिर जरा और मृत्यु की तो क्या बात।”

Verse 7

न हाहानि निवर्तन्ते न मासा न पुन: क्षपा: | सो<थयं प्रपद्यते5ध्वानं चिराय ध्रुवमध्रुव:

भीष्म बोले—दिन लौटते नहीं, न महीने, न फिर रात्रियाँ। इस प्रकार यह देहधारी—स्वयं अनित्य और क्षणभंगुर—दीर्घ यात्रा पर निकल पड़ता है उस ध्रुव (निश्चित) की ओर, जो मृत्यु है।

Verse 8

दिन, रात और महीनोंके जो चक्र चल रहे हैं, वे किसीके टाले नहीं टलते हैं। इसी प्रकार जन्म, मृत्यु और जरा आदिके क्रम प्रायः चलते ही रहते हैं। जिसके जीवनका कुछ ठिकाना नहीं, वह मरणधर्मा मानव कभी दीर्घ-कालके पश्चात्‌ नित्यपथ (मोक्षमार्ग) का आश्रय लेता है ।।

भीष्म कहते हैं—दिन-रात और महीनों का चक्र निरन्तर घूमता है; उसे कोई रोक नहीं सकता। उसी प्रकार जन्म, जरा और मृत्यु की परम्परा भी प्रायः अविराम चलती रहती है। जीवन का ठिकाना निश्चित नहीं; इसलिए मरणधर्मा मनुष्य बहुत काल के पश्चात् ही शाश्वत पथ—मोक्षमार्ग—का आश्रय लेता है। काल एक अप्लव सागर के समान है; समस्त प्राणी उसके प्रवाह से सदा बहाए जाते हैं, और विचार-मनन करने वाला भी उस काल-सागर में डूबने लगता है।

Verse 9

नैवास्य कश्चिद्‌ भवति नासौ भवति कस्यचित्‌

भीष्म बोले—वास्तव में न तो कोई उसका अपना होता है, न वह किसी का अपना होता है।

Verse 10

पथि सज्ज्तमेवेदं दारैरन्यैश्व बन्धुभि: । नायमत्यन्तसंवासो लब्धपूर्वो हि केनचित्‌

भीष्म बोले—देखो, जीवन-पथ पर मनुष्य पत्नी और अन्य बन्धुओं में ही उलझ जाता है; पर किसी ने भी उनके साथ पूर्ण, अविच्छिन्न सहवास कभी नहीं पाया—ऐसा स्थायी साथ कहीं नहीं मिलता।

Verse 11

यहाँ इस जीवका कोई भी अपना नहीं है और वह भी किसीका अपना नहीं है। रास्तेमें मिले हुए राहगीरोंके समान यहाँ पत्नी तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंका साथ हो जाता है, परंतु यहाँ पहले कभी किसीने किसीके साथ चिरकालतक सहवासका सुख नहीं उठाया है ।।

भीष्म बोले—इस लोक में किसी जीव का कोई अपना नहीं, और वह भी किसी का अपना नहीं। मार्ग में मिले पथिकों के समान यहाँ पत्नी तथा अन्य बन्धु-बान्धवों का संयोग हो जाता है; पर यहाँ पहले कभी किसी ने किसी के साथ दीर्घकाल तक सहवास का सुख नहीं भोगा। वे बार-बार विलाप करते रहें, तो भी काल उन्हें विनाश में झोंक देता है—जैसे वायु गर्जते मेघ-समूहों को बारंबार उड़ा-उड़ाकर छिन्न-भिन्न कर देती है।

Verse 12

जरामृत्यू हि भूतानां खादितारी वृकाविव । बलिनां दुर्बलानां च हस्वानां महतामपि,कोई बलवान हों या दुर्बल, बड़ा हों या छोटा, उन सब प्राणियोंको बुढ़ापा और मौत व्याप्रकी भाँति खा जाती है

भीष्म बोले—बुढ़ापा और मृत्यु दो भेड़ियों की भाँति समस्त प्राणियों को खा जाते हैं—चाहे बलवान हों या दुर्बल, छोटे हों या बड़े।

Verse 13

एवं भूतेषु भूतात्मा नित्यभूतो<च्रुवेषु च । कथं हि हृष्येज्जातेषु मृतेषु च कथं ज्वरेत्‌

भीष्म बोले—जब सब प्राणी अनित्य हैं, तब उन अनित्य देहों में स्थित नित्य आत्मा जन्म पर हर्ष क्यों करे, और मृत्यु पर शोक से क्यों जले?

Verse 14

कुतो5हमागत: को5स्मि क्व गमिष्यामि कस्य वा । कस्मिन्‌ स्थित: क्व भविता कस्मात्किमनुशोचसि

भीष्म बोले—मैं कहाँ से आया हूँ? मैं कौन हूँ? कहाँ जाऊँगा? वास्तव में मेरा किससे क्या सम्बन्ध है? किस अवस्था में स्थित होकर मैं फिर किस योनि/स्थिति में जन्म लूँगा? जब ये बातें ही अनिश्चित और चंचल हैं, तब तुम किस कारण से—और किस बात पर—शोक कर रहे हो?

Verse 15

द्रष्टा स्वर्गस्थ को5न्यो5स्ति तथैव नरकस्य च । आगरमांस्त्वनतिक्रम्य दद्याच्चैव यजेत च

भीष्म बोले—कर्म करने वाले के सिवा और कौन है जो स्वर्ग का तथा उसी प्रकार नरक का दर्शन और भोग करेगा? इसलिए शास्त्र-आज्ञाओं का उल्लंघन न करते हुए दान दे और यज्ञ तथा अन्य शुभ कर्म करता रहे।

Verse 83

जरामृत्युमहाग्राहे न कश्चिदभिपद्यते । काल समस्त प्राणियोंका उच्छेद कर डालता है। जैसे जलका प्रवाह किसी वस्तुको बहाये लिये जाता है

भीष्म बोले—जरा और मृत्यु रूपी महाग्राह के ग्रास से कोई भी नहीं बच सकता। काल समस्त प्राणियों का उच्छेद कर देता है। जैसे जल का प्रवाह किसी वस्तु को अपने वेग से बहा ले जाता है, वैसे ही काल निरन्तर प्राणियों को बहा ले जाता है। वह काल बिना नौका के समुद्र की भाँति तरंगित होता रहता है; उसमें जरा और मृत्यु विशाल ग्राह बनकर बैठे हैं। उस काल-सागर में बहते और डूबते हुए जीव को कोई भी बचा नहीं सकता।

Verse 319

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञजचशिखजनकसंवादे एकोनविंशत्यधिकत्रिशततमो< ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में पंचशिख और राजा जनक के संवाद का तीन सौ उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

The chapter juxtaposes renunciation and liberation-seeking with filial bonds: Śuka’s attainment and departure are praised, yet the text acknowledges Vyāsa’s attachment and designs a respectful mechanism (the world’s echoing reply) to manage separation.

Liberation practice is portrayed as methodical and verified: cultivate seclusion and composure, stabilize the body-mind progressively, maintain detachment, and proceed with guidance/authorization from realized authorities rather than impulse.

No explicit phalaśruti formula is stated here; instead, the chapter’s meta-function is demonstrative—using public recognition by sages, directions, and celestial witnesses to mark yogic attainment as an authoritative model within Mokṣa-dharma.