Śukasya Janma-yoga-phalaṁ — Vyāsasya Tapasā Putrārthaḥ (Śānti-parva 310)
अव्यक्त च महान्तं च तथाहड़कार एव च | पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्न॒ पञचमम्,प्रकृतियाँ आठ बतायी गयी हैं और उनके विकार सोलह। अध्यात्मशास्त्रका चिन्तन करनेवाले विद्वान् आठ प्रकृतियोंके नाम इस प्रकार बतलाते हैं--अव्यक्त (मूल प्रकृति), महत्तत्त्व, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी
avyaktaṃ ca mahāntaṃ ca tathāhaṅkāra eva ca | pṛthivī vāyur ākāśam āpo jyotiṣ ca pañcamam ||
याज्ञवल्क्य बोले—अव्यक्त (मूल प्रकृति), महत्तत्त्व और अहंकार; तथा पंचभूत—पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज (अग्नि/ज्योति)—ये आठ ‘प्रकृतियाँ’ कही गई हैं। इन्हीं से सोलह विकार उत्पन्न होते हैं—ऐसा आत्मविद्या का चिन्तन करने वाले मनीषी मानते हैं।
याज़्ञवल्क्य उवाच