
सुवर्णष्ठीविनोपाख्यानम् (The Account of Suvarṇaṣṭhīvin)
Upa-parva: Rāja-dharma / Exempla of Grief-Management (Sṛñjaya–Suvarṇaṣṭhīvin Episode)
Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira requests Nārada to explain the origin and events surrounding Suvarṇaṣṭhīvin. Nārada narrates how he and the sage Parvata were hosted with due ritual honor by King Sṛñjaya. When offered a boon, Sṛñjaya initially expresses contentment, but at Parvata’s insistence he asks for a heroic, long-lived son of Indra-like brilliance. Parvata grants the son but indicates a limitation regarding longevity, noting the king’s underlying wish to rival Indra. The child is born and becomes renowned as Kāñcana/Suvarṇaṣṭhīvin. Indra, apprehensive, directs his vajra (personified as an agent) to observe and later a tiger-form attack occurs, resulting in the child’s death; the event is presented as divinely engineered concealment. In anguish, Sṛñjaya remembers Nārada, who appears, reiterates prior counsel, and—by Indra’s consent—revives the child. The restored son later rules for an extraordinary span, performs major sacrifices, sustains lineage, and dies in due course. Nārada closes by instructing the listener (implicitly Yudhiṣṭhira) to desist from grief, aligning with Kṛṣṇa and Vyāsa’s broader counsel: bear inherited sovereignty, perform meritorious rites, and pursue duly attained worlds.
Chapter Arc: युद्धोत्तर शोक में डूबे धर्मराज युधिष्ठिर नारद से एक अद्भुत आख्यान माँगते हैं—सुवर्णष्ठीवी के जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवन का वृत्तान्त, ताकि जीवन-मरण के रहस्य पर प्रकाश पड़े। → नारद बताते हैं कि यह वही विषय है जिसे केशव ने कहा था; वे शेष कथा सुनाने लगते हैं—कैसे सत्कार, वर-याचना, और देव-इच्छा के बीच एक राजपुत्र का भाग्य मृत्यु की ओर धकेला जाता है, और फिर भी नियति में पुनर्जीवन की संभावना चमकती है। → इन्द्र स्वयं ‘मूर्तिमान’ होकर दिव्यास्त्र/दैवी प्रेरणा के साथ सामने आता है और आदेश देता है—‘व्याघ्र बनकर राजपुत्र का वध करो’; यहीं मृत्यु का निर्णायक क्षण और दैवी हस्तक्षेप का तीखा रहस्य एक साथ प्रकट होता है। → नारद निष्कर्ष देते हैं कि केशव के वचनों के अनुसार उस शोकाकुल राजा को यह कथा सुनाई गई; वासव (इन्द्र) की अनुमति से पुनर्जीवन घटित हुआ, फिर उसने कुल-परम्परा बढ़ाने वाले अनेक पुत्र उत्पन्न किए और दीर्घकाल बाद कालधर्म को प्राप्त हुआ। → नारद धर्मराज को सीधे उपदेश देते हैं—अपने शोक को हटाकर पितृ-पैतामह राज्य का भार उठाओ, यज्ञों द्वारा पुण्यलोक प्राप्त करो—और यह प्रश्न छोड़ते हैं कि युधिष्ठिर क्या सचमुच शोक से ऊपर उठकर राजधर्म में स्थिर हो पाएँगे।
Verse 1
नशा (0) आस सऔ आसन एकत्रिशो< ध्याय: सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त वैशम्पायन उवाच ततो राजा पाण्डुसुतो नारदं प्रत्यभाषत । भगवज्छोतुमिच्छामि सुवर्णष्लीविसम्भवम्
वैशम्पायनजी बोले—तब पाण्डुपुत्र राजा ने नारदजी से कहा—“भगवन्! मैं सुवर्णष्ठीवी के जन्म का वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ।”
Verse 2
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने नारदजीसे कहा--'भगवन्! मैं सुवर्णष्ठीवीके जन्मका वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ ।। एवमुक्तस्तु स मुनिर्धर्मराजेन नारद: । आचचक्षे यथावृत्तं सुवर्णष्ठीविनं प्रति,धर्मराजके ऐसा कहनेपर नारदमुनिने सुवर्णष्टीवीके जन्मका यथावत् वृत्तान्त कहना आरम्भ किया
वैशम्पायनजी बोले—जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर ने नारदजी से कहा—“भगवन्! मैं सुवर्णष्ठीवी के जन्म का वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ।” धर्मराज के ऐसा कहने पर नारदमुनि ने सुवर्णष्ठीवी के विषय में यथावत्, जैसा घटित हुआ था, वैसा ही वृत्तान्त कहना आरम्भ किया।
Verse 3
नारद उवाच एवमेतन्महाबाहो यथायं केशवोडब्रवीत् । कार्यस्यास्य तु यच्छेष॑ तत् ते वक्ष्यामि पृच्छत:,नारदजी बोले--महाबाहो! भगवान् श्रीकृष्णने इस विषयमें जैसा कहा है, वह सब सत्य है। इस प्रसड़में जो कुछ शेष है, वह तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं बता रहा हूँ
नारदजी बोले—महाबाहो! भगवान् श्रीकृष्ण ने इस विषय में जैसा कहा है, वैसा ही सत्य है। अब इस प्रसंग में जो कुछ शेष रह गया है, वह तुम्हारे प्रश्न के अनुसार मैं बताता हूँ।
Verse 4
अहं च पर्वतश्चैव स्वस्रीयो मे महामुनि: । वस्तुकामावभिगतौ सूंजयं जयतां वरम्
नारदजी बोले—मैं और मेरे भानजे महामुनि पर्वत, किसी अभिलाषा को लेकर, विजयी वीरों में श्रेष्ठ सूंजय के पास पहुँचे।
Verse 5
मैं और मेरे भानजे महामुनि पर्वत दोनों विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सूंजयके यहाँ निवास करनेके लिये गये ।। तत्रावां पूजितौ तेन विधिदृष्टेन कर्मणा । सर्वकामै: सुविहिती निवसावो<स्य वेश्मनि,वहाँ राजाने हम दोनोंका शास्त्रीय विधिके अनुसार पूजन किया और हमारे लिये सभी मनोवाञ्छित वस्तुओंके प्राप्त होनेकी सुव्यवस्था कर दी। हम दोनों उनके महलमें रहने लगे
नारदजी बोले—मैं और मेरे भानजे महामुनि पर्वत, विजयी वीरों में श्रेष्ठ राजा सूंजय के यहाँ निवास करने के लिए गए। वहाँ राजा ने शास्त्रीय विधि के अनुसार हमारा पूजन किया और हमारे लिए सभी मनोवांछित वस्तुओं की प्राप्ति की उत्तम व्यवस्था कर दी। इस प्रकार हम दोनों उनके महल में रहने लगे।
Verse 6
व्यतिक्रान्तासु वर्षासु समये गमनस्य च । पर्वतो मामुवाचेदं काले वचनमर्थवत्,जब वर्षाके चार महीने बीत गये और हमलोगोंके वहाँसे चलनेका समय आया, तब पर्वतने मुझसे समयोचित एवं सार्थक वचन कहा--
जब वर्षा ऋतु बीत गई और हमारे वहाँ से चलने का समय आया, तब पर्वत ने मुझसे समयोचित और सार्थक वचन कहा।
Verse 7
आवामस्यथ नरेन्द्रस्य गृहे परमपूजितौ । उषितौ समये ब्रह्मंंस्तद् विचिन्तय साम्प्रतम्,“मामा! हमलोग राजा सूंजयके घरमें बड़े आदर-सत्कारके साथ रहे हैं, अतः ब्रह्मन! इस समय इनका कुछ उपकार करनेकी बात सोचिये'
नारदजी बोले—हम दोनों इस नरेन्द्र के घर में परम आदर-सत्कार के साथ रहे हैं; अतः हे ब्राह्मण! अब इस समय विचार करो कि हम इनके लिए प्रत्युपकार क्या करें।
Verse 8
ततो5हमत्रवं राजन् पर्वतं शुभदर्शनम् । सर्वमेतत् त्वयि विभो भागिनेयोपपद्यते,राजन! तब मैंने शुभदर्शी पर्वत मुनिसे कहा--“भगिनीपुत्र! यह सब तुम्हें ही शोभा देता है
तब, हे राजन्, मैंने शुभदर्शी मुनि पर्वत से कहा—“हे विभो, हे भागिनेय! यह सब तुम्हीं पर शोभा देता है।”
Verse 9
वरेण च्छन्द्यतां राजा लभतां यद् यदिच्छति । आवयोस्तपसा सिरद्!) प्राप्नोतु यदि मन्यसे
नारद ने कहा—“राजा को मनोवांछित वर देकर संतुष्ट किया जाए; वे जो-जो चाहें, वह सब उन्हें प्राप्त हो। और यदि तुम्हें उचित लगे, तो हम दोनों की तपस्या के फल से वे परम फल को प्राप्त करें।”
Verse 10
“राजाको मनोवाञ्छित वर देकर संतुष्ट करो। वे जो-जो चाहते हैं, वह सब उन्हें मिले। तुम्हारी राय हो तो हम दोनोंकी तपस्यासे उनके मनोरथकी सिद्धि हो” ।। तत आहूय राजानं सूंजयं जयतां वरम् । पर्वतो5नुमतो वाक्यमुवाच कुरुपुज़व,कुरुश्रेष्ठ! तब मेरी अनुमति ले पर्वतने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सृंजयको बुलाकर कहा --
नारद ने कहा—“राजा को मनोवांछित वर देकर संतुष्ट करो। वे जो-जो चाहते हैं, वह सब उन्हें मिले। तुम्हारी सम्मति हो तो हम दोनों की तपस्या से उनके मनोरथ की सिद्धि हो।” फिर मेरी अनुमति पाकर पर्वत ने विजयी वीरों में श्रेष्ठ राजा सृंजय को बुलाया और कहा—“हे कुरुपुंगव, हे कुरुश्रेष्ठ!”
Verse 11
प्रीतो स्वो नृप सत्कारैर्भवदार्जवसम्भृतै: । आवाभ्यामभ्यनुज्ञातो वरं नृवर चिन्तय,“नरेश्वर! हम दोनों तुम्हारे द्वारा सरलतापूर्वक किये गये सत्कारसे बहुत प्रसन्न हैं। हम तुम्हें आज्ञा देते हैं कि तुम इच्छानुसार कोई वर सोचकर माँग लो
नारद ने कहा—“हे नृप! तुम्हारे सरल भाव से किए गए सत्कार से हम दोनों अत्यन्त प्रसन्न हैं। अतः हमारी अनुमति से, हे नृवर, तुम अपनी इच्छा के अनुसार कोई वर सोचकर माँग लो।”
Verse 12
देवानामविहिंसायां न भवेन्मानुषक्षयम् । तद् गृहाण महाराज पूजाहों नौ मतो भवान्,महाराज! कोई ऐसा वर माँग लो, जिससे न तो देवताओंकी हिंसा हो और न मनुष्योंका संहार ही हो सके। तुम हमारी दृष्टिमें आदरके योग्य हो”
नारद ने कहा—“ऐसा वर माँगो कि न देवताओं की हिंसा हो और न मनुष्यों का संहार। हे महाराज, यह हमारा उपदेश ग्रहण करो; हमारी दृष्टि में तुम पूज्य हो।”
Verse 13
यृंजय उवाच प्रीती भवन्तौ यदि मे कृतमेतावता मम । एष एव परो लाभो निर्वत्तों मे महाफल:,सृंजयने कहा--ब्रह्मन्! यदि आप दोनों प्रसन्न हैं तो मैं इतनेसे ही कृतकृत्य हो गया। यही हमारे लिये महान् फलदायक परम लाभ सिद्ध हो गया
यृंजय ने कहा— ब्रह्मन्! यदि मेरे किए हुए इस कार्य से आप दोनों प्रसन्न हैं, तो मैं इतने से ही कृतकृत्य हो गया। यही मेरे लिए परम लाभ है— महान् और फलदायक सिद्धि।
Verse 14
तमेवंवादिनं भूय: पर्वत: प्रत्यभाषत । वृणीष्व राजन् संकल्पं यत् ते हृदि चिरं स्थितम्,राजन्! ऐसी बात कहनेवाले राजा सूंजयसे पर्वतमुनिने फिर कहा--“राजन्! तुम्हारे हृदयमें जो चिरकालसे संकल्प हो, वही माँग लो'
राजा के ऐसा कहने पर पर्वतमुनि ने फिर कहा— “राजन्! तुम्हारे हृदय में जो संकल्प चिरकाल से स्थित है, वही वर माँग लो।”
Verse 15
संजय उवाच अभीषप्सामि सुतं वीरं वीरवन्तं दृढव्रतम् । आयुष्मन्तं महाभागं देवराजसमद्युतिम्,संजय बोले--भगवन्! मैं एक ऐसा पुत्र पाना चाहता हूँ, जो वीर, बलवान, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाला, आयुष्मान, परम सौभाग्यशाली और देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हो
संजय बोले— “भगवन्! मैं ऐसा पुत्र चाहता हूँ जो वीर, बलवान, दृढ़व्रती, आयुष्मान, महाभाग और देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी हो।”
Verse 16
पर्वत उवाच भविष्यत्येष ते कामो न त्वायुष्मान् भविष्यति । देवराजाभि भूत्यर्थ संकल्पो होष ते हृदि,पर्वतने कहा--राजन्! तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण होगा, परंतु वह पुत्र दीर्घायु नहीं हो सकेगा; क्योंकि देवराज इन्द्रको पराजित करनेके लिये तुम्हारे हृदयमें यह संकल्प उठा है
पर्वत ने कहा— “राजन्! तुम्हारी यह कामना पूर्ण होगी, पर वह पुत्र दीर्घायु नहीं होगा; क्योंकि देवराज इन्द्र को पराजित करने का संकल्प तुम्हारे हृदय में उठा है।”
Verse 17
ख्यात: सुवर्णष्ठीवीति पुत्रस्तव भविष्यति । रक्ष्यश्ष देवराजात् स देवराजसमद्युति:,तुम्हारा वह पुत्र सुवर्णष्ठीवीके नामसे विख्यात तथा देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी होगा। तुम्हें देवराजसे सदा उसकी रक्षा करनी चाहिये
पर्वत ने कहा— “तुम्हारा पुत्र ‘सुवर्णष्ठीवी’ नाम से विख्यात होगा और देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी होगा। इसलिए तुम्हें उसे देवराज (इन्द्र) से सदा बचाकर रखना चाहिए।”
Verse 18
तच्छुत्वा सूंजयो वाक््यं पर्वतस्य महात्मन: । प्रसादयामास तदा नैतदेवं भवेदिति,महात्मा पर्वतका यह वचन सुनकर सूंजयने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करते हुए कहा --'ऐसा न हो। मुने! आपकी तपस्यासे मेरा पुत्र दीर्घजीवी होना चाहिये।” परंतु इन्द्रका ख्याल करके पर्वत मुनि कुछ नहीं बोले
महात्मा पर्वत मुनि के वचन सुनकर सूंजय ने उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा करते हुए कहा—“ऐसा न हो, मुने! आपकी तपस्या के प्रभाव से मेरा पुत्र दीर्घजीवी हो।” परन्तु इन्द्र की इच्छा का विचार करके पर्वत मुनि मौन रहे।
Verse 19
आयुष्मान् मे भवेत् पुत्रो भवतस्तपसा मुने । न च त॑ पर्वत: किंचिदुवाचेन्द्रव्यपेक्षया,महात्मा पर्वतका यह वचन सुनकर सूंजयने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करते हुए कहा --'ऐसा न हो। मुने! आपकी तपस्यासे मेरा पुत्र दीर्घजीवी होना चाहिये।” परंतु इन्द्रका ख्याल करके पर्वत मुनि कुछ नहीं बोले
सूंजय ने कहा—“मुने! आपकी तपस्या के प्रभाव से मेरा पुत्र आयुष्मान् हो।” परन्तु इन्द्र की ओर दृष्टि रखकर पर्वत मुनि ने आगे कुछ भी न कहा।
Verse 20
तमहं नृपतिं दीनमब्रवं पुनरेव च । स्मर्तव्यो5स्मि महाराज दर्शयिष्यामि ते सुतम्,तब मैंने दीन हुए उस नरेशसे कहा--“महाराज! संकटके समय मुझे याद करना। मैं तुम्हारे पुत्रको तुमसे मिला दूँगा। पृथ्वीनाथ! चिन्ता न करो। यमराजके वशभमें पड़े हुए तुम्हारे उस प्रिय पुत्रको मैं पुनः: उस रूपमें लाकर तुम्हें दे दूँगा”
तब मैंने उस दीन नरेश से फिर कहा—“महाराज! संकट के समय मुझे स्मरण करना; मैं तुम्हें तुम्हारा पुत्र दिखाऊँगा।”
Verse 21
अहं ते दयितं पुत्र प्रेतराजवशं गतम् | पुनर्दास्यामि तद्रूपं मा शुच: पृथिवीपते,तब मैंने दीन हुए उस नरेशसे कहा--“महाराज! संकटके समय मुझे याद करना। मैं तुम्हारे पुत्रको तुमसे मिला दूँगा। पृथ्वीनाथ! चिन्ता न करो। यमराजके वशभमें पड़े हुए तुम्हारे उस प्रिय पुत्रको मैं पुनः: उस रूपमें लाकर तुम्हें दे दूँगा”
“हे पृथ्वीनाथ! तुम्हारा प्रिय पुत्र यमराज के वश में चला गया है; मैं उसे उसी रूप में फिर तुम्हें लौटा दूँगा। शोक मत करो।”
Verse 22
एवमुक््त्वा तु नृपतिं प्रयातौ स्वो यथेप्सितम् । सृंजयश्व यथाकामं प्रविवेश स्वमन्दिरम्,राजासे ऐसा कहकर हम दोनों अपने अभीष्ट स्थानको चल दिये और राजा सूंजयने अपने इच्छानुसार महलमें प्रवेश किया
राजा से ऐसा कहकर हम दोनों अपने-अपने अभीष्ट स्थान को चले गए; और सूंजय राजा भी अपनी इच्छा के अनुसार अपने महल में प्रविष्ट हुए।
Verse 23
सूृंजयस्याथ राजर्षे: कस्मिंश्वित् कालपर्यये । जज्ञे पुत्रो महावीर्यस्तेजसा प्रज्वलन्निव,तदनन्तर किसी समय राजर्षि सृंजयके एक पुत्र हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। वह महान् बलशाली था
पर्वत बोले— हे राजर्षे! किसी समय-परिवर्तन में सृंजय के यहाँ एक महावीर्यवान पुत्र उत्पन्न हुआ, जो अपने ही तेज से मानो प्रज्वलित हो रहा था। वह असाधारण बल से सम्पन्न था।
Verse 24
ववृधे स यथाकालं सरसीव महोत्पलम् | बभूव काजञ्चनष्ठीवी यथार्थ नाम तस्य तत्,जैसे सरोवरमें कमल बढ़ता है, उसी प्रकार वह राजकुमार यथासमय बढ़ने लगा। वह मुखसे स्वर्ण उगलनेके कारण सुवर्णष्ठीवी नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका वह नाम सार्थक था
वह यथासमय वैसे ही बढ़ा, जैसे सरोवर में बड़ा कमल बढ़ता है। मुख से सुवर्ण थूकने के कारण वह ‘सुवर्णष्ठीवी’ नाम से प्रसिद्ध हुआ; उसका नाम सचमुच सार्थक था।
Verse 25
तदद्भुततमं लोके पप्रथे कुरुसत्तम | बुबुधे तच्च देवेन्द्रो वरदानं महर्षित:
हे कुरुश्रेष्ठ! वह अत्यन्त अद्भुत घटना संसार में फैल गई। देवराज इन्द्र ने भी जान लिया कि यह महर्षि के वरदान का फल है।
Verse 26
कुरुश्रेष्ठ उसका वह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त सारे जगतमें फैल गया। देवराज इन्द्रको भी यह मालूम हो गया कि वह बालक महर्षि पर्वतके वरदानका फल है ।। ततः स्वाभिभवाद् भीतो बृहस्पतिमते स्थित: । कुमारस्यान्तरप्रेक्षी बभूव बलवृत्रहा,तदनन्तर अपनी पराजयसे डरकर बृहस्पतिकी सम्मतिके अनुसार चलते हुए बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र उस राजकुमारके वधका अवसर देखने लगे
तदनन्तर अपनी पराजय की आशंका से भयभीत होकर, बृहस्पति की सम्मति के अनुसार चलते हुए, बल और वृत्र का वध करने वाले इन्द्र उस कुमार के वध का अवसर ताकने लगे।
Verse 27
चोदयामास तद् वस्ं दिव्यास्त्रं मूर्तिमत् स्थितम् व्याप्रो भूत्वा जहीम॑ त्वं राजपुत्रमिति प्रभो,प्रभो! इन्द्रने मूर्तिमानू होकर सामने खड़े हुए अपने दिव्य अस्त्र वज़से कहा--“वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजकुमारको मार डालो। जैसा कि इसके विषयमें पर्वतने बताया है, बड़ा होनेपर सूृंजयका यह पुत्र अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर देगा”
तब इन्द्र ने सामने मूर्तिमान होकर स्थित अपने दिव्य अस्त्र वज्र से कहा— “हे प्रभो वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजपुत्र को मार डालो।”
Verse 28
प्रवृद्ध; किल वीर्येण मामेषो&भिभविष्यति । सृंजयस्य सुतो वज्र यथैनं पर्वतो<5ब्रवीत्,प्रभो! इन्द्रने मूर्तिमानू होकर सामने खड़े हुए अपने दिव्य अस्त्र वज़से कहा--“वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजकुमारको मार डालो। जैसा कि इसके विषयमें पर्वतने बताया है, बड़ा होनेपर सूृंजयका यह पुत्र अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर देगा”
“यह बड़ा होकर अपने पराक्रम से मुझे अवश्य परास्त कर देगा।” ऐसा कहकर पर्वत ने इन्द्र-तेज से मूर्तिमान होकर सामने खड़े दिव्य अस्त्र वज्र से कहा—“वज्र! व्याघ्र का रूप धारण कर इस राजकुमार का वध कर दे। जैसा कि पर्वत ने बताया है, बड़ा होने पर सृंजय का यह पुत्र अपने शौर्य से मुझे पराजित कर देगा।”
Verse 29
एवमुक्तस्तु शक्रेण वज्ञ: परपुरञण्जय: । कुमारमन्तरप्रेक्षी नित्यमेवान्वपद्यत,इन्द्रके ऐसा कहनेपर शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला वज्र मौका देखता हुआ सदा उस राजकुमारके आस-पास ही रहने लगा
इन्द्र (शक्र) के ऐसा कहने पर शत्रुओं की पुरी को जीतने वाला वज्र अवसर की ताक में रहता हुआ सदा उस राजकुमार के निकट ही रहने लगा।
Verse 30
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमानुशासनपर्वमें नारद और पर्वतका उपाख्यानविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,सूृंजयो<पि सुतं प्राप्प देवराजसमद्युतिम् । हृष्ट: सान््त:पुरो राजा वननित्यो बभूव ह
सृंजय को भी देवराज के समान तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र-प्राप्ति से प्रसन्न होकर राजा अपने अंतःपुर सहित वन में रहने वाला, संयम-निष्ठ जीवन अपनाने वाला हो गया।
Verse 31
तदनन्तर एक दिन निर्जन वनमें गड़ाजीके तटपर वह बालक धायको साथ लेकर खेलनेके लिये गया और इधर-उधर दौड़ने लगा,इति श्रीमहा भारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि स्वर्णष्टीविसम्भवोपाख्याने एकत्रिंशो5ध्याय:
तदनन्तर एक दिन वह बालक धाय के साथ खेलने के लिए निर्जन वन में गड़ा नदी के तट पर गया और वहाँ इधर-उधर दौड़ने लगा।
Verse 32
पञज्चवर्षकदेशीयो बालो नागेन्द्रविक्रम: । सहसोत्पतितं व्याप्रमाससाद महाबलम्,उस बालककी अवस्था अभी पाँच वर्षकी थी तो भी वह गजराजके समान पराक्रमी था। वह सहसा उछलकर आये हुए एक महाबली बाघके पास जा पहुँचा
उस बालक की अवस्था अभी पाँच वर्ष की ही थी, तो भी वह गजराज के समान पराक्रमी था। सहसा उछलकर आए हुए एक महाबली बाघ के पास वह तुरंत जा पहुँचा।
Verse 33
सूंजय भी देवराजके समान पराक्रमी पुत्र पाकर रानी-सहित बड़े प्रसन्न हुए और निरन्तर वनमें ही रहने लगे। ततो भागीरथीतीरे कदाचिन्निर्जने वने । धात्रीद्वितीयो बाल: स क्रीडार्थ पर्यधावत,स बालस्तेन निष्पिष्टो वेपमानो नृपात्मज: । व्यसु: पपात मेदिन्यां ततो धात्री विचुक्कुशे उस बाघने वहाँ काँपते हुए राजकुमारको गिराकर पीस डाला। वह प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। यह देखकर धाय चिल्ला उठी
फिर एक बार भागीरथी के तट पर निर्जन वन में, केवल धाय के साथ वह राजकुमार खेल-खेल में इधर-उधर दौड़ रहा था। तभी वहाँ एक बाघ ने काँपते हुए बालक को पकड़कर कुचल डाला; वह प्राणहीन होकर धरती पर गिर पड़ा। यह देखकर धाय अत्यन्त दुःख से चिल्ला उठी।
Verse 34
हत्वा तु राजपुत्र स तत्रैवान्तरधीयत । शार्टूलो देवराजस्य माययान्तर्हितस्तदा
राजपुत्र को मारकर वह वहीं उसी स्थान पर अदृश्य हो गया। उस समय देवराज की माया से वह शार्दूल (बाघ) छिप गया।
Verse 35
राजकुमारकी हत्या करके देवराज इन्द्रका भेजा हुआ वह वज्ररूपी बाघ मायासे वहीं अदृश्य हो गया ।। धात्र्यास्तु निनदं श्रुत्वा रुदत्या: परमार्तवत् । अभ्यधावत तं देशं स्वयमेव महीपति:,रोती हुई धायका वह आर्तनाद सुनकर राजा सूंजय स्वयं ही उस स्थानपर दौड़े हुए आये
राजपुत्र की हत्या करके देवराज इन्द्र का भेजा हुआ वह वज्र-तुल्य बाघ माया से वहीं अदृश्य हो गया। रोती हुई धाय का वह परम आर्तनाद सुनकर राजा सूंजय स्वयं ही उस स्थान की ओर दौड़ पड़े।
Verse 36
स ददर्श शयानं तं गतासुं पीतशोणितम् । कुमारं विगतानन्दं निशाकरमिव च्युतम्,उन्होंने देखा, राजकुमार प्राणशून्य होकर आकाशसे गिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति पड़ा है। उसका सारा रक्त बाघके द्वारा पी लिया गया है और वह आनन्दहीन हो गया है
उन्होंने उस राजकुमार को पड़ा हुआ देखा—प्राणहीन, जिसका रक्त पी लिया गया था। वह आनन्द से रहित, मानो आकाश से गिरा हुआ चन्द्रमा हो।
Verse 37
स तमुत्सड़मारोप्य परिपीडितमानस: । पुत्र रुधिरसंसिक्तं पर्यदेवयदातुर:
मन से अत्यन्त पीड़ित होकर उसने उसे कूड़े के ढेर पर उठा कर रख दिया; फिर पुत्र को रक्त से सना देखकर वह व्याकुल होकर चारों ओर विलाप करने लगा।
Verse 38
खूनसे लथपथ हुए उस बालकको गोदमें लेकर व्यथितचित्त हुए राजा सूंजय व्याकुल होकर विलाप करने लगे ।। ततस्ता मातरस्तस्य रुदत्य: शोककर्शिता: । अभ्यधावन्त तं॑ देशं यत्र राजा स सूंजय:
तब शोक से कृश हुईं उसकी माताएँ रोती-बिलखती हुई उस स्थान की ओर वेग से दौड़ीं, जहाँ राजा सूंजय व्याकुल होकर विलाप कर रहे थे।
Verse 39
तदनन्तर शोकसे पड़ित हो उसकी माताएँ रोती हुई उस स्थानकी ओर दौड़ीं, जहाँ राजा सूंजय विलाप करते थे ।। ततः स राजा सस्मार मामेव गतमानस: । तदाहं चिन्तन ज्ञात्वा गतवांस्तस्य दर्शनम्
तब वह राजा, शोक में डूबा और मन से विह्वल होकर, केवल मुझे ही स्मरण करने लगा। यह बात अपने ध्यान-ज्ञान से जानकर मैं उसके दर्शन के लिए वहाँ गया।
Verse 40
| हक! गिरती) ॥ मयैतानि च वाक्यानि श्रावित: शोकलालस: । यानि ते यदुवीरेण कथितानि महीपते
पर्वत ने कहा—हे महीपते! शोक में आकुल होकर मैंने ये ही वचन सुने हैं—जो यदुवीर ने तुमसे कहे थे।
Verse 41
पृथ्वीनाथ! यदुवीर श्रीकृष्णने जो बातें तुम्हारे सामने कही हैं, उन्हींको मैंने उस शोकाकुल राजाको सुनाया ।। संजीवितश्चापि पुनर्वासवानुमते तदा । भवितव्यं तथा तच्च न तच्छक्यमतो<न्यथा,फिर इन्द्रकी अनुमतिसे उस बालकको जीवित भी कर दिया। उसकी वैसी ही होनहार थी। उसे कोई पलट नहीं सकता था
तब वासव (इन्द्र) की अनुमति से उस बालक को फिर जीवित भी कर दिया गया। पर जो होना था, वह वैसा ही हुआ; इसलिए उसे अन्यथा करना संभव न था।
Verse 42
तत ऊर्ध्व कुमारस्तु स्वर्णछ्लीवी महायशा: । चित्तं प्रसादयामास पितुर्मातुश्च वीर्यवान्,तदनन्तर महायशस्वी और शक्तिशाली कुमार सुवर्णष्टीवीने जीवित होकर पिता और माताके चित्तको प्रसन्न किया
तदनन्तर जीवित होकर महायशस्वी और पराक्रमी कुमार सुवर्णष्टीवी ने पिता और माता के चित्त को प्रसन्न कर दिया।
Verse 43
कारयामास राज्यं च पितरि स्वर्गते नूप । वर्षाणां शतमेक॑ च सहस््रं भीमविक्रम:,नरेश्वरर! उस भयानक पराक्रमी कुमारने पिताके स्वर्ग-वासी हो जानेपर ग्यारह सौ वर्षोतक राज्य किया
पर्वत बोले—राजन्! पिता के स्वर्गवासी हो जाने पर उस भयानक पराक्रमी, महाबली कुमार ने ग्यारह सौ वर्षों तक राज्य का संचालन किया।
Verse 44
तत ईजे महायजैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणै: । तर्पयामास देवांश्व पितृश्वैव महाद्युति:,तदनन्तर उस महातेजस्वी राजकुमारने बहुत-सी दक्षिणावाले अनेक महायज्ञोंका अनुष्ठान किया और उनके द्वारा देवताओं तथा पितरोंकी तृप्ति की
तदनन्तर उस महातेजस्वी ने बहुत-सी दक्षिणाओं से युक्त अनेक महायज्ञों का अनुष्ठान किया; और उन कर्मों द्वारा देवताओं तथा पितरों को तृप्त किया।
Verse 45
उत्पाद्य च बहून् पुत्रान् कुलसंतानकारिण: । कालेन महता राजन् कालधर्ममुपेयिवान्,राजन! इसके बाद उसने बहुत-से वंशप्रवर्तक पुत्र उत्पन्न किये और दीर्घकालके पश्चात् वह काल-धर्मको प्राप्त हुआ
राजन्! इसके बाद उसने वंश की परम्परा चलाने वाले बहुत-से पुत्र उत्पन्न किए; और दीर्घकाल के पश्चात् वह काल-धर्म को प्राप्त हुआ।
Verse 46
स त्वं राजेन्द्र संजातं शोकमेनं निवर्तय । यथा त्वां केशव: प्राह व्यासश्व॒ सुमहातपा:,राजेन्द्र! तुम भी अपने ह्ृदयमें उत्पन्न हुए इस शोकको दूर करो तथा भगवान् श्रीकृष्ण और महातपस्वी व्यासजी जैसा कह रहे हैं, उसके अनुसार अपने बाप-दादोंके राज्यपर आरूढ़ हो इसका भार वहन करो; फिर पुण्यदायक महायज्ञोंका अनुष्ठान करके तुम अभीष्ट लोकमें चले जाओगे
राजेन्द्र! अतः अपने हृदय में उत्पन्न इस शोक को दूर करो; और जैसा केशव तथा महातपस्वी व्यास ने तुमसे कहा है, वैसा ही करो।
Verse 47
पितृपैतामहं राज्यमास्थाय धुरमुद्गह । इष्ट्वा पुण्यर्महायज्ञैरिष्ट लोकमवाप्स्यसि,राजेन्द्र! तुम भी अपने ह्ृदयमें उत्पन्न हुए इस शोकको दूर करो तथा भगवान् श्रीकृष्ण और महातपस्वी व्यासजी जैसा कह रहे हैं, उसके अनुसार अपने बाप-दादोंके राज्यपर आरूढ़ हो इसका भार वहन करो; फिर पुण्यदायक महायज्ञोंका अनुष्ठान करके तुम अभीष्ट लोकमें चले जाओगे
पितृ-पैतामह राज्य को ग्रहण करके शासन-भार उठाओ; और पुण्यदायक महायज्ञों का अनुष्ठान करके तुम अभीष्ट लोक को प्राप्त करोगे।
The dilemma is whether a ruler’s desire for exceptional power and legacy (a son of Indra-like brilliance) can be pursued without provoking destabilizing consequences, and how the ruler should respond ethically when that desire is met by sudden, externally imposed loss.
Personal bereavement must not collapse public duty: composure is cultivated by recognizing inevitability (kāla), the boundedness of boons and agency, and the necessity of returning to righteous rule, ritual obligations, and lineage stewardship.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter ends with explicit applicative counsel: the king should abandon grief, assume the burdensome ancestral kingdom, and perform meritorious sacrifices—positioning the narrative as an exemplum whose ‘fruit’ is ethical stabilization and orientation toward higher worlds.