जनक–सुलभा संवादः
Janaka–Sulabhā Dialogue on Mokṣa and Non-attachment
बुध्यमानो5प्रबुद्धेन समतां याति मैथिल । सड्रधर्मा भवत्येष नि:सज़्भात्मा नराधिप
वसिष्ठ बोले—हे मैथिल! जब जीवात्मा अप्रबुद्ध जडवर्ग को अपना मानकर उससे तादात्म्य करता है, तब वह उसी जडवर्ग की समता को प्राप्त होता है। स्वरूप से असंग होते हुए भी प्रकृति-संसर्ग से वह षड्धर्मों (आसक्ति आदि) वाला हो जाता है, हे नराधिप।
वसिष्ठ उवाच