Jarā-Mṛtyu-anatikrama: Janaka–Pañcaśikha-saṃvāda
Aging and Death Cannot Be Overstepped
परस्परस्य विद्यां वै त्वं निबोधानुपूर्वश: । यथोक्तमृषिभिस्तात सांख्यस्याभिनिदर्शनम्
तात! ऋषियों ने सांख्य के जिस प्रकार निरूपण किया है, उसी के अनुसार तुम अब परस्पर-सम्बन्धित तत्त्वों में जो-जो जिसकी ‘विद्या’ अर्थात् श्रेष्ठता है, उसे क्रम से समझो।
वसिष्ठ उवाच