अव्यक्त–पुरुष–विवेकः (Discrimination of Avyakta/Prakṛti and Puruṣa) — Yājñavalkya’s Anvīkṣikī to Viśvāvasu
क्षेत्र जानाति चाव्यक्तं क्षेत्रज्ञ इति चोच्यते । आव्यक्तिके पुरे शेते पुरुषश्वेति कथ्यते
वह अव्यक्त नामक क्षेत्र (प्रकृति) को जानता है, इसलिए ‘क्षेत्रज्ञ’ कहलाता है; और अव्यक्त से बने प्राकृत शरीर-रूपी पुरों में अन्तर्यामी रूप से शयन करने के कारण उसे ‘पुरुष’ कहा जाता है।
वसिष्ठ उवाच