अव्यक्त-गुण-पुरुषविवेकः | Avyakta, Guṇas, and Discrimination of Puruṣa
सुखमेव तु कर्तव्यं सकृत् कृत्वा सुखं मम । यावदन्तं च मे सौख्यं जात्यां जात्यां भविष्यति
मुझे तो सुख के साधन-रूप पुण्य का ही अनुष्ठान करना चाहिए। उसका एक बार भी आचरण कर लेने पर मुझे जीवन-भर सुख मिलेगा और आगे भी प्रत्येक जन्म में सुख की प्राप्ति होती रहेगी।
वसिष्ठ उवाच