Adhyāya 302: Guṇa-vicāra, Gati-bheda, and the Imperishable State
Yājñavalkya–Janaka
तमसा तामसान् भावान् विविधानू् प्रतिपद्यते । रजसा राजसांश्वैव सात्त्विकान् सत्त्वसंश्रयात्
तमोगुण के प्रभाव से वह मोह आदि नाना प्रकार के तामस भावों को प्राप्त होता है; रजोगुण से प्रकृति-प्रवृत्ति आदि राजस भावों को; और सत्त्वगुण का आश्रय लेकर प्रकाश आदि सात्त्विक भावों को प्राप्त करता है।
वसिष्ठ उवाच