Vasiṣṭha–Karāla-Janaka Saṃvāda: Aśuddha-Sevana, Guṇa-Dr̥ṣṭi, and Sāṃkhya–Yoga Ekārthatā
Mahābhārata 12.293
वत्तिश्वैन्नास्ति शूद्रस्थ पितृपैतामही श्लुवा । न वृत्तिं परतो मार्गेच्छुश्रूषां तु प्रयोजयेत्
यदि शूद्र के पास पिता-पितामहों से चली आई कोई निश्चित जीविका न हो, तो वह दूसरी किसी वृत्ति की खोज न करे; तीनों वर्णों की सेवा को ही अपनी जीविका का साधन बनाए।
पराशर उवाच