Adhyaya 292
Shanti ParvaAdhyaya 29224 Verses

Adhyaya 292

Vasiṣṭha on Saṃsāra, Guṇas, and Misattributed Agency (Mahābhārata 12.292)

Upa-parva: Mokṣa-dharma Parva (Liberation Teachings Sub-Book)

Vasiṣṭha describes how, due to non-awakening (apratibuddhatva), ignorance continues to ‘follow’ the being across thousands of bodies, moving through animal, human, and divine conditions and also into states of suffering. The chapter uses the cocoon-weaving insect as an analogy for self-entanglement: as the insect binds itself with its own threads, so the ostensibly ‘aguṇa’ self becomes bound by guṇas through identification. A wide catalogue of embodied dualities is presented—illnesses, pains, and physiological afflictions—alongside an equally extensive list of ascetic postures, beds, garments, diets, fasts, vows, and ritualized disciplines, framed as objects of ‘abhimāna’ (appropriative identification). The discourse then articulates a guṇa-based account of action: prakṛti performs acts that yield auspicious/inauspicious results, and prakṛti also ‘consumes’ those results across the three loci of experience (tiryak, manuṣya, deva). The chapter culminates in a diagnostic of false superimposition, where the agentless principle imagines itself endowed with senses, time, mortality, motion, field, creation, fear, and other predicates—thereby sustaining saṃsāra through mamatā.

Chapter Arc: पराशर-गीता का उपदेश एक कठोर सामाजिक सत्य से आरम्भ होता है—जिसे गौरव, स्नेह और सदाचार छोड़ देना हो, उसे संसार भी छोड़ देता है; यहाँ से धर्म का मूल्य ‘कर्म’ और ‘आचरण’ में स्थापित किया जाता है, न कि केवल संबंधों या दावों में। → उपदेश आगे बढ़कर बताता है कि मनुष्य जन्म से ही अनेक ऋणों (देवता, अतिथि, भृत्य/आश्रित, पितृ, और आत्मा) से बँधा है; यदि वह इन ऋणों को न चुकाए तो उसका जीवन अधूरा और धर्म-हीन रह जाता है। इसी बीच अतिथि-सत्कार की कसौटी रखी जाती है—भव्य दान नहीं, बल्कि उपलब्ध फल-पत्र से भी संतोष कराना ही सच्चा धर्म है (शैब्य-राजा का दृष्टान्त)। → चरम बिन्दु पर ‘ऋणवान् जायते मर्त्यः’ का घोष होता है—मनुष्य को अनृण (ऋण-मुक्त) होने की साधना करनी ही चाहिए; साथ ही उशना (शुक्राचार्य) का प्रसंग आता है कि देवाधिदेव महादेव की प्रसन्नता और देवी-स्तुति से उन्हें ‘शुक्रत्व’ और यश प्राप्त हुआ—अर्थात् धर्म का सर्वोच्च फल ईश्वर-प्रसाद और यश/उन्नति के रूप में प्रकट होता है। → अध्याय निष्कर्ष देता है कि सदाचार और सत्कर्म का अविच्छिन्न पालन ही वास्तविक यज्ञ है—अग्निहोत्र न हो सके तब भी आचरण-शुद्धि से मनुष्य ‘अग्निहोत्री’ तुल्य है; साथ ही अग्नि, आत्मा, माता, पिता और गुरु की यथायोग्य सेवा को धर्म-जीवन की स्थायी रीढ़ बताया जाता है।

Shlokas

Verse 1

अपना बा | अर द्विनवत्यथधिकद्विशततमो< ध्याय: पराशरगीता--धर्मो पार्जित धनकी श्रेष्ठता, अतिथि- सत्कारका महत्त्व, पाँच प्रकारके ऋणोंसे छूटनेकी विधि, भगवत्स्तवनकी महिमा एवं सदाचार तथा गुरुजनोंकी सेवासे महान्‌ लाभ पराशर उवाच कः: कस्य चोपकुरुते कश्न कस्मै प्रयच्छति । प्राणी करोत्ययं कर्म सर्वमात्मार्थमात्मना,पराशरजी कहते हैं--राजन्‌! कौन किसका उपकार करता है और कौन किसको देता है? यह प्राणी सारा कार्य स्वयं अपने ही लिये करता है

पराशरजी बोले—राजन्! कौन किसका उपकार करता है और कौन किसको देता है? यह प्राणी सारा कर्म अपने ही स्वार्थ के लिये, अपने ही बल से करता है।

Verse 2

गौरवेण परित्यक्तं नि:स्नेहं परिवर्जयेत्‌ । सोदर्य भ्रातरमपि किमुतान्यं पृथग्जनम्‌

जो व्यक्ति तिरस्कारपूर्वक त्याग दे और स्नेहरहित हो, उसका परित्याग कर देना चाहिये। यदि ऐसी दशा में सगे भाई तक का त्याग उचित है, तो फिर पराये साधारण जन की तो बात ही क्या।

Verse 3

अपना सगा भाई भी यदि अपने श्रेष्ठ स्वभावका और स्नेहका त्याग कर दे तो लोग उसको त्याग देते हैं; फिर दूसरे किसी साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्‍या है ।। विशिष्टस्य विशिष्टाच्च तुल्यौ दानप्रतिग्रहौ । तयो: पुण्यतरं दान॑ तद्‌ द्विजस्य प्रयच्छत:

श्रेष्ठ पुरुष द्वारा दिया गया दान और श्रेष्ठ पुरुष से प्राप्त प्रतिग्रह—ये दोनों समान माने जाते हैं; परन्तु इन दोनों में दान अधिक पुण्यदायक है, विशेषतः जब वह योग्य द्विज (ब्राह्मण) को दिया जाये।

Verse 4

श्रेष्ठ पुरुषको दिया हुआ दान और श्रेष्ठ पुरुषसे प्राप्त हुआ प्रतिग्रह--इन दोनोंका महत्त्व बराबर है तो भी इन दोनोंमेंसे ब्राह्मणके लिये प्रतिग्रह स्वीकार करनेकी अपेक्षा दान देना अधिक पुण्यमय माना गया है ।। न्यायागतं धनं चैव न्यायेनैव विवर्धितम्‌ | संरक्ष्यं यत्नमास्थाय धर्मार्थमिति निश्चय:,जो धन न्यायसे प्राप्त किया गया हो और न्यायसे ही बढ़ाया गया हो, उसको यत्नपूर्वक धर्मके उद्देश्यसे बचाये रखना चाहिये। यही धर्मशास्त्रका निश्चय है

जो धन न्याय से प्राप्त किया गया हो और न्याय से ही बढ़ाया गया हो, उसे यत्नपूर्वक सुरक्षित रखना चाहिये—इस दृढ़ निश्चय के साथ कि वह धर्म के प्रयोजन में लगे; यही धर्मशास्त्रों का निर्णय है।

Verse 5

न धर्मार्थी नृशंसेन कर्मणा धनमर्जयेत्‌ । शक्तित: सर्वकार्याणि कुर्यन्नद्धिमनुस्मरेत्‌

धर्म का इच्छुक पुरुष क्रूर या निर्दयी कर्मों से धन न कमाए। अपनी शक्ति के अनुसार समस्त कर्तव्य करे और सदा परम हित—उच्चतम कल्याण—का स्मरण रखे।

Verse 6

धर्म चाहनेवाले पुरुषको क्रूरकर्मके द्वारा धनका उपार्जन नहीं करना चाहिये। अपनी शक्तिके अनुसार समस्त शुभ कर्म करे। धन बढ़ानेकी चिन्तामें न पड़े ।। अपो हि प्रयत: शीतास्तापिता ज्वलनेन वा । शक्तितो5तिथये दत्त्वा क्षुधार्तायाश्वुते फलम्‌,जो मौसमका विचार करके अपनी शक्तिके अनुसार प्यासे और भूखे अतिथिको ठंडा या गरम किया हुआ जल और अन्न पवित्रभावसे अर्पण करता है, वह उत्तम फल पाता है

पराशर कहते हैं—धर्म चाहने वाले पुरुष को क्रूर या हानिकारक कर्मों से धन का उपार्जन नहीं करना चाहिए। अपनी शक्ति के अनुसार समस्त शुभ कर्म करे और धन बढ़ाने की चिंता में न डूबे। क्योंकि जो ऋतु का विचार करके, अपनी सामर्थ्य के अनुसार, प्यासे-भूखे अतिथि को शुद्ध भाव से ठंडा जल या अग्नि से गरम किया हुआ जल तथा अन्न अर्पित करता है, वह उत्तम पुण्यफल पाता है।

Verse 7

रन्तिदेवेन लोकेष्टा सिद्धि: प्राप्ता महात्मना । फलपपत्रैरथो मूलैर्मुनीनर्चितवांश्ष सः,महात्मा राजा रन्तिदेवने फल-मूल और पत्तोंसे ऋषि-मुनियोंका पूजन किया था। इसीसे उन्हें वह सिद्धि प्राप्त हुई, जिसकी सब लोग अभिलाषा रखते हैं

महात्मा राजा रन्तिदेव ने लोक में सबके द्वारा अभिलषित सिद्धि प्राप्त की। उन्होंने फल, पत्ते और मूल जैसे सरल अर्पणों से ऋषि-मुनियों का पूजन किया; इससे प्रकट होता है कि सच्ची श्रद्धा और निष्काम अतिथि-सेवा ही परम फल देती है, न कि वैभव।

Verse 8

तैरेव फलपन्रैश्न स माठरमतोषयत्‌ । तस्माल्लेभे परं स्थान शैब्योडपि पृथिवीपति:,पृथ्वीपालक महाराज शैब्यने भी उन फल और पत्रोंसे ही माठर मुनिको संतुष्ट किया था, जिससे उन्हें उत्तम लोककी प्राप्ति हुई

उन्हीं फलों और पत्तों से राजा शैब्य ने माठर मुनि को संतुष्ट किया। इसलिए पृथ्वीपति होकर भी शैब्य ने परम स्थान प्राप्त किया। यह बताता है कि श्रद्धा से दी गई सरल भेंटें भौतिक समृद्धि से बढ़कर होती हैं और उच्च लोक का द्वार खोलती हैं।

Verse 9

देवतातिथि भृत्येभ्य: पितृभ्यश्चात्मनस्तथा । ऋणवान्‌ जायते मर्त्यस्तस्मादनृणतां व्रजेत्‌,प्रत्येक मनुष्य देवता, अतिथि, भरण-पोषणके योग्य कुटुम्बीजन, पितर तथा अपने- आपका भी ऋणी होकर जन्म लेता है; अतः उसे उस ऋणसे मुक्त होनेका यत्न करना चाहिये

पराशर ने कहा—मनुष्य जन्म से ही देवताओं, अतिथि, अपने आश्रितों, पितरों तथा अपने-आप के प्रति ऋणी होता है। इसलिए उसे इन ऋणों से मुक्त होने के लिए, प्रत्येक के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करते हुए, प्रयत्न करना चाहिए।

Verse 10

स्वाध्यायेन महर्षिभ्यो देवेभ्यो यज्ञकर्मणा । पितृभ्य: श्राद्धदानेन नृणामभ्यर्चनेन च,वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करके ऋषियोंके, यज्ञ-कर्मद्वारा देवताओंके, श्राद्ध और दानसे पितरोंके तथा स्वागत-सत्कार, सेवा आदिसे अतिथियोंके ऋणसे छुटकारा होता है

वेद-शास्त्रों का स्वाध्याय करके ऋषियों के ऋण से, यज्ञ-कर्म द्वारा देवताओं के ऋण से, श्राद्ध-दान से पितरों के ऋण से तथा अतिथियों और मनुष्यों के सत्कार-सेवा से मनुष्य मानव-ऋण से मुक्त होता है।

Verse 11

वाचा शेषावहार्येण पालनेनात्मनो5पि च । यथावद्‌ भृत्यवर्गस्य चिकीर्षेत्‌ कर्म आदित:,इसी प्रकार वेद-वाणीके पठन, श्रवण एवं मननसे, यज्ञशेष अन्नके भोजनसे तथा जीवोंकी रक्षा करनेसे मनुष्य अपने ऋणसे मुक्त होता है। भरणीय कुटुम्बीजनके पालन- पोषणका आरम्भसे ही प्रबन्ध करना चाहिये। इससे उनके ऋणसे भी मुक्ति हो जाती है

इसी प्रकार वेद-वाणी का पठन, श्रवण और मनन करके, यज्ञ-शेष अन्न का ही भोजन करके तथा प्राणियों की रक्षा करते हुए मनुष्य अपने ऋणों से मुक्त होता है। और जो आश्रित जन हैं, उनके पालन-पोषण का प्रबन्ध आरम्भ से ही यथाविधि करना चाहिए—इससे उनका ऋण भी उतर जाता है।

Verse 12

प्रयत्नेन च संसिद्धा धनैरपि विवर्जिता: । सम्यग्‌ हुत्वा हुतवहं मुनयः सिद्धिमागता:,ऋषि-मुनियोंके पास धन नहीं था तो भी वे अपने प्रयत्नसे ही सिद्ध हो गये। उन्होंने विधिपूर्वक अग्निहोत्र करके सिद्धि प्राप्त की थी

ऋषि-मुनियों के पास धन नहीं था, फिर भी वे अपने प्रयत्न से ही सिद्ध हो गए। उन्होंने विधिपूर्वक अग्नि में आहुति देकर सिद्धि प्राप्त की।

Verse 13

विश्वामित्रस्य पुत्रत्वमृचीकतनयो5गमत्‌ | ऋग्भि: स्तुत्वा महाबाहो देवान्‌ वै यज्ञभागिन:,महाबाहो! ऋचीकके पुत्र यज्ञमें भाग लेनेवाले देवताओंकी वेदमन्त्रोंद्वारा स्तुति करके विश्वामित्रके पुत्र हो गये

महाबाहो! ऋचीक के पुत्र ने यज्ञ में भाग पाने वाले देवताओं की ऋग्वेद-मन्त्रों से स्तुति करके विश्वामित्र का पुत्रत्व प्राप्त कर लिया।

Verse 14

गत: शुक्रत्वमुशना देवदेवप्रसादनात्‌ । देवीं स्तुत्वा तु गगने मोदते यशसा वृत:

देवों के देव की प्रसन्नता से उशना शुक्रत्व को प्राप्त हुआ। देवी की स्तुति करके वह यश से आवृत होकर आकाश में आनन्दित होता है।

Verse 15

महर्षि उशना देवाधिदेव महादेवजीको प्रसन्न करके उनके शुक्रत्वको प्राप्त हो उसी नामसे प्रसिद्ध हुए। साथ ही पार्वतीदेवीकी स्तुति करके वे यशस्वी मुनि आकाशभमें ग्रहरूपसे स्थित हो आनन्द भोग रहे हैं ।। असितो देवलश्लैव तथा नारदपर्वतौ । कक्षीवान्‌ जामदग्न्यश्न रामस्ताण्ड्यस्तथा55त्मवान्‌,असित, देवल, नारद, पर्वत, कक्षीवान्‌, जमदग्नि-नन्दन परशुराम, मनको वशमें रखनेवाले ताण्ड्य, वसिष्ठ, जमदग्नि, विश्वामित्र, अत्रि, भरद्वाज, हरिश्मश्रु, कुण्डधार तथा श्रुतश्रवा--इन महर्षियोंने एकाग्रचित्त हो वेदकी ऋचाओंद्वारा भगवान्‌ विष्णुकी स्तुति करके उन्हीं बुद्धिमान श्रीहरिकी कृपासे तपस्या करके सिद्धि प्राप्त कर ली

पाराशर बोले—महर्षि उशना (शुक्र) ने देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न करके ‘शुक्रत्व’ प्राप्त किया और उसी नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने पार्वतीदेवी की भी स्तुति की; वह यशस्वी मुनि अब आकाश में ग्रह-रूप से स्थित होकर दिव्य आनन्द का भोग कर रहे हैं। इसी प्रकार असित, देवल, नारद और पर्वत, कक्षीवान्, जमदग्नि-नन्दन राम (परशुराम), मन को वश में रखने वाले ताण्ड्य तथा अन्य महर्षि—वसिष्ठ, जमदग्नि, विश्वामित्र, अत्रि, भरद्वाज, हरिश्मश्रु, कुण्डधार और श्रुतश्रवा—इन सबने एकाग्रचित्त होकर वेद की ऋचाओं से भगवान् विष्णु की स्तुति की और उस बुद्धिमान श्रीहरि की कृपा से तपस्या द्वारा सिद्धि प्राप्त की।

Verse 16

वसिष्ठो जमदन्निश्ष विश्वामित्रो$त्रिरेव च | भरद्वाजो हरिश्मश्रु: कुण्डधार: श्रुतश्रवा:,असित, देवल, नारद, पर्वत, कक्षीवान्‌, जमदग्नि-नन्दन परशुराम, मनको वशमें रखनेवाले ताण्ड्य, वसिष्ठ, जमदग्नि, विश्वामित्र, अत्रि, भरद्वाज, हरिश्मश्रु, कुण्डधार तथा श्रुतश्रवा--इन महर्षियोंने एकाग्रचित्त हो वेदकी ऋचाओंद्वारा भगवान्‌ विष्णुकी स्तुति करके उन्हीं बुद्धिमान श्रीहरिकी कृपासे तपस्या करके सिद्धि प्राप्त कर ली

पाराशर बोले—वसिष्ठ, जमदग्नि, विश्वामित्र, अत्रि, भरद्वाज, हरिश्मश्रु, कुण्डधार, श्रुतश्रवा, असित, देवल, नारद, पर्वत, कक्षीवान्, जमदग्नि-पुत्र राम (परशुराम) और मन को वश में रखने वाले ताण्ड्य—ये सब महर्षि एकाग्रचित्त होकर वेद की ऋचाओं से भगवान् विष्णु की स्तुति करते रहे। उस बुद्धिमान श्रीहरि की कृपा से उन्होंने तपस्या की और सिद्धि प्राप्त की।

Verse 17

एते महर्षय: स्तुत्वा विष्णुमृग्भि: समाहिता: । लेभिरे तपसा सिद्धि प्रसादात्‌ तस्य धीमत:,असित, देवल, नारद, पर्वत, कक्षीवान्‌, जमदग्नि-नन्दन परशुराम, मनको वशमें रखनेवाले ताण्ड्य, वसिष्ठ, जमदग्नि, विश्वामित्र, अत्रि, भरद्वाज, हरिश्मश्रु, कुण्डधार तथा श्रुतश्रवा--इन महर्षियोंने एकाग्रचित्त हो वेदकी ऋचाओंद्वारा भगवान्‌ विष्णुकी स्तुति करके उन्हीं बुद्धिमान श्रीहरिकी कृपासे तपस्या करके सिद्धि प्राप्त कर ली

पाराशर बोले—इन महर्षियों ने एकाग्रचित्त होकर वेद की ऋचाओं से विष्णु की स्तुति की और उस बुद्धिमान प्रभु की कृपा से तपस्या द्वारा सिद्धि प्राप्त की। उनमें असित, देवल, नारद, पर्वत, कक्षीवान्, जमदग्नि-नन्दन परशुराम, मन को वश में रखने वाले ताण्ड्य, वसिष्ठ, जमदग्नि, विश्वामित्र, अत्रि, भरद्वाज, हरिश्मश्रु, कुण्डधार और श्रुतश्रवा थे।

Verse 18

अनहश्नाहतां प्राप्ता: सन्त: स्तुत्वा तमेव ह । नतु वृद्धिमिहान्विच्छेत्‌ कर्म कृत्वा जुगुप्सितम्‌,जो पूजाके योग्य नहीं थे, वे भी भगवान्‌ विष्णुकी स्तुति करके पूजनीय संत होकर उन्हींको प्राप्त हो गये। इस लोकमें निन्दनीय आचरण करके किसीको भी अपने अभ्युदयकी आशा नहीं रखनी चाहिये

पाराशर बोले—जो पूजनीय नहीं थे, वे भी उसी प्रभु की स्तुति करके संत बन गये, पूज्य हो गये और उसी को प्राप्त हो गये। इसलिए इस लोक में निन्दनीय और घृणित कर्म करके किसी को भी अपने अभ्युदय या उन्नति की आशा नहीं रखनी चाहिए।

Verse 19

येडर्था धर्मेण ते सत्या येडधर्मेण घिगस्तु तान्‌ । धर्म वै शाश्व॒तं लोके न जह्माद्‌ धनकाड्क्षया,धर्मका पालन करते हुए ही जो धन प्राप्त होता है, वही सच्चा धन है। जो अधर्मसे प्राप्त होता है, वह धन तो धिककार देने योग्य है। संसारमें धनकी इच्छासे शाश्वत धर्मका त्याग कभी नहीं करना चाहिये

पाराशर बोले—धर्म के द्वारा जो धन प्राप्त होता है, वही सच्चा धन है; अधर्म से जो मिलता है, वह धन धिक्कार के योग्य है। इसलिए धन की लालसा से इस संसार में शाश्वत धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए।

Verse 20

आहितानिनेहिं धर्मात्मा यः स पुण्यकृदुत्तम: । वेदा हि सर्वे राजेन्द्र स्थितास्त्रिष्वग्निषु प्रभो,राजेन्द्र! जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वही धर्मात्मा है और वही पुण्यकर्म करनेवालोंमें श्रेष्ठ है। प्रभो सम्पूर्ण वेद दक्षिण, आहवनीय तथा गार्हपत्य--इन तीन अग्नियोंमें ही स्थित हैं

पराशर बोले—राजेन्द्र! जिसने पवित्र अग्नियों की स्थापना की है और जो प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वही वास्तव में धर्मात्मा है और पुण्यकर्म करने वालों में श्रेष्ठ है। हे नृपश्रेष्ठ! मानो समस्त वेद गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिण—इन तीन अग्नियों में ही प्रतिष्ठित हैं।

Verse 21

स चाप्यग्न्याहितो विप्र: क्रिया यस्य न हीयते । श्रेयो हानाहिताग्नित्वमग्निहोत्रं न निष्क्रियम्‌

और वह ब्राह्मण भी, जिसने अग्नियों की स्थापना की है और जिसकी नियत क्रियाएँ कभी शिथिल नहीं होतीं—उसके लिए निष्क्रिय, निष्फल और अनुशासन-रहित अग्निहोत्र करने से तो अग्नि न रखना ही श्रेष्ठ है।

Verse 22

जिसका सदाचार एवं सत्कर्म कभी लुप्त नहीं होता, वह ब्राह्मण (अग्निहोत्र न करनेपर भी) अन्निहोत्री ही है। सदाचारका ठीक-ठीक पालन होनेपर अग्निहोत्र न हो सके तो भी अच्छा है; किंतु सदाचारका त्याग करके केवल अग्निहोत्र करना कदापि कल्याणकारी नहीं है।। अग्निरात्मा च माता च पिता जनयिता तथा । गुरुश्न नरशार्दूल परिचर्या यथातथम्‌

जिसका सदाचार और सत्कर्म कभी लुप्त नहीं होता, वह ब्राह्मण (अग्निहोत्र न कर सके तो भी) अग्निहोत्री ही माना जाता है। सदाचार का यथावत् पालन हो और यदि अग्निहोत्र न हो सके तो भी वह श्रेयस्कर है; पर सदाचार त्यागकर केवल अग्निहोत्र करना कभी कल्याणकारी नहीं। फिर, नरशार्दूल! अग्नि, आत्मा, माता, जन्म देनेवाले पिता और गुरु—इन सबकी यथायोग्य सेवा करनी चाहिए।

Verse 23

पुरुषसिंह! अग्नि, आत्मा, माता, जन्म देनेवाले पिता तथा गुरु--इन सबकी यथायोग्य सेवा करनी चाहिये ।। मान त्यक्त्वा यो नरो वृद्धसेवी विद्वान्‌ क्लीब: पश्यति प्रीतियोगात्‌ । दाक्ष्येण हीनो धर्मयुक्तो नदान्तो लोकेडस्मिन्‌ वै पूज्यते सद्धरिरार्य:,जो अभिमानका त्याग करके वृद्ध पुरुषोंकी सेवा करता, विद्वान्‌ एवं काम-भोगमें अनासक्त होकर सबको प्रेमभावसे देखता, मनमें चतुराई न रखकर धर्ममें संलग्न रहता और दूसरोंका दमन या हिंसा नहीं करता है, वह मनुष्य इस लोकमें श्रेष्ठ है तथा सत्पुरुष भी उसका आदर करते हैं

पराशर बोले—नरशार्दूल! अग्नि, आत्मा, माता, जन्मदाता पिता और गुरु—इन सबकी यथायोग्य, यथाविधि सेवा करनी चाहिए। जो मनुष्य अभिमान त्यागकर वृद्धों की सेवा करता है, जो विद्वान् है और विषय-भोग में अनासक्त है, जो प्रेमभाव से सबको देखता है, जो कपट-चातुर्य से रहित है, जो धर्म में स्थित है और दूसरों का दमन या हिंसा नहीं करता—वही इस लोक में आर्य, श्रेष्ठ और सत्पुरुषों द्वारा पूजित होता है।

Verse 292

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायां द्विनवत्यधिकद्वधिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में पराशरगीता-विषयक दो सौ बानवेवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

The chapter analyzes the appropriation of experiences and practices as ‘I’ and ‘mine’ (abhimāna/mamatā), which converts bodily dualities, austerities, and ritual identities into binding conditions that perpetuate rebirth.

Recognize guṇa-driven prakṛti as the domain of action and consequence, and reduce superimposition of agency onto the self; this discriminative stance weakens attachment to both suffering and self-styled virtue as identity.

Rather than a formal phalaśruti, it supplies an interpretive key: understanding how misattributed predicates (sense, time, mortality, motion) arise through ignorance is presented as essential to ‘crossing over’ dualities and loosening saṃsāric recurrence.