Adhyāya 287 — Janaka’s Inquiry on Śreyas, Abhayadāna, and Asaṅga
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एतस्मात् कारणाच्छेय: कलिलं प्रतिभाति मे । ब्रवीतु भगवांस्तन्मे उपसन्नोडस्म्यधीहि भो:
etasmāt kāraṇāc chreyaḥ kalilaṁ pratibhāti me | bravītu bhagavāṁs tan me upasanno 'smy adhīhi bhoḥ ||
इस कारण मुझे श्रेय का स्वरूप संशय और भ्रम से आच्छन्न प्रतीत होता है। हे भगवन्! अब आप ही मुझे उसका उपदेश दें। मैं आपकी शरण में आया हूँ—हे पूज्यवर, मुझे शिक्षा दीजिए और परम कल्याण के मार्ग का बोध कराइए।
भीष्म उवाच