अध्याय २८६ — पराशर-उपदेशः
Ethical Restraint, Mortality, and Karma
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य नायोगाद् विन्दते सुखम् । धृतिश्न दुःखत्यागश्नेत्युभयं तु सुखं नूप
जिसका चित्त योगयुक्त नहीं है, उसे समत्व-बुद्धि प्राप्त नहीं होती; और योग के बिना कोई सुख नहीं पाता। नरेश्वर! दुःख-संबन्ध का त्याग और धैर्य—ये दोनों ही सुख के कारण हैं।
समड़ उवाच