जनक–पराशर संवादः — वर्ण-गोत्र-धर्मविचारः
Janaka–Parāśara: Varṇa, Gotra, and Dharma Inquiry
इन्द्रियैस्तु प्रदीपार्थ क्रियते बुद्धिरन्तरा । निश्चक्षुर्भिरजानद्धिरिन्द्रियाणि प्रदीपवत्
वस्तुओं को प्रकाशित करने के लिए इन्द्रियाँ बीच में बुद्धि को रखती हैं। स्वयं इन्द्रियाँ तो ज्ञान-शक्ति से रहित, दीपक के समान केवल सहायक मात्र हैं।
भीष्म उवाच