जनक–पराशर संवादः — वर्ण-गोत्र-धर्मविचारः
Janaka–Parāśara: Varṇa, Gotra, and Dharma Inquiry
न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते । सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतान् परिवर्तते
वह कभी भी न सुख में रहती है, न दुःख में। यह भावस्वरूप बुद्धि इन तीन भावों (गुणों) के बीच ही घूमती रहती है।
भीष्म उवाच