Adhyāya 283: Varṇa-vṛtti, Nyāya-ārjana, and the Decline-and-Restoration of Dharma (वर्णवृत्तिः न्यायार्जनं च)
देव्युवाच सुप्राकृतो5पि पुरुष: सर्व: स्त्रीजनसंसदि । स्तौति गर्वायते चापि स्वमात्मानं न संशय:
देवी ने कहा—नाथ! अत्यन्त गँवार पुरुष भी क्यों न हो, प्रायः सभी स्त्रियों के बीच अपनी प्रशंसा के गीत गाते और अपनी श्रेष्ठता पर गर्व करते हैं—इसमें तनिक भी संशय नहीं है।
दक्ष उवाच