Śreyas-nirdeśa (Discerning the Superior Good): Nārada–Gālava Saṃvāda
वाड्मन:कर्मयज्ञश्व भविष्याम्युदगायने । सूर्यके उत्तरायण होनेपर शान्तिमय यज्ञमें तत्पर
सूर्य के उत्तरायण होने पर मैं शान्तिमय यज्ञ में तत्पर, जितेन्द्रिय, ब्रह्मयज्ञ-परायण और मननशील बनूँगा। जप-स्वाध्याय रूप वाग्यज्ञ, ध्यान रूप मनोयज्ञ और शास्त्रविहित कर्मों का निष्काम भाव से आचरण रूप कर्मयज्ञ—इन तीनों का अनुष्ठान करूँगा।
भीष्म उवाच