Viṣṇor Māhātmya and Indriya-saṃyama (विष्णोर्माहात्म्यं तथा इन्द्रियसंयमः)
ततः स सुचिरं दृष्टवा स्पृहालग्नेन चक्षुषा । मृगमालोक्य हिंसायां स्वर्गवासं समर्थयत्
तब सत्य की आँखें लालसा से उसी ओर लग गईं। उसने बहुत देर तक वह रमणीय दृश्य देखा; फिर मृग की ओर देखकर मन-ही-मन निश्चय किया कि ‘हिंसा करने पर ही मुझे स्वर्गवास का सुख मिल सकता है।’
नारद उवाच