Yudhiṣṭhira’s Remorse and Vyāsa’s Teaching on Impermanence (Śoka-nivāraṇa)
नाल॑ सुखाय सुह्दो नाल॑ दुःखाय शत्रव: । न च प्रजालमर्थेभ्यो न सुखेभ्यो5प्यलं धनम्,न तो सुहृद् सुख देनेमें समर्थ हैं न शत्रु दुख देनेमें। इसी प्रकार न तो प्रजा धन दे सकती है और न धन सुख दे सकता है
nālaṁ sukhāya suhṛdo nālaṁ duḥkhāya śatravaḥ | na ca prajālam arthebhyo na sukhebhyo 'py alaṁ dhanam ||
व्यास ने कहा—न तो सुहृद् ही सुख देने में पर्याप्त हैं, न शत्रु ही दुःख देने में पर्याप्त। इसी प्रकार न प्रजा मात्र से धन उत्पन्न होता है, और न धन मात्र से सुख सिद्ध होता है।
व्यास उवाच