नारद–असित (देवल) संवादः — भूतप्रभवाप्यय, इन्द्रिय-गुण-विवेक, क्षेत्रज्ञ-तत्त्व
नायं लोको>स्त्ययज्ञानां परश्रेति विनिश्चय: । वेदवादविदश्नैव प्रमाणमु भयं तदा
यह निश्चय है कि जो यज्ञ नहीं करते, उनके लिए न यह लोक है और न परलोक। और वेदवाद के ज्ञाता उस समय प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों को ही प्रमाण मानते हैं।
कपिल उवाच