पापात्म-धर्मात्म-लक्षणम् तथा निर्वेदेन मोक्षमार्गः | Marks of the Sinful and the Righteous; Dispassion (Nirveda) as a Path to Liberation
शिशो: शुश्रूषणाच्छुश्रूममाता देहमनन्तरम् । चेतनावान् नरो हन्याद् यस्य नासुषिरं शिर:
शिशु की सेवा-शुश्रूषा करके वह ‘शुश्रू’ नाम धारण करती है। माता ही देह के बाद सबसे निकट का आश्रय है। जिसका मस्तिष्क विचार-शून्य नहीं हुआ, ऐसा कोई सचेत मनुष्य कभी अपनी माता की हत्या नहीं कर सकता।
भीष्म उवाच