कुण्डधारोपाख्यानम्
Kuṇḍadhāra-Upākhyāna: Dharma’s Superiority over Wealth and Desire
श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धयेतरत् । “किंतु एक बार यज्ञमें प्रजापतिने उनके इस बर्तावको देखकर कहा--'देवताओ! तुमने यह अनुचित किया है। वास्तवमें उदारका अन्न उसकी श्रद्धाके कारण पवित्र होता है और कंजूसका अश्रद्धाके कारण अपवित्र एवं नष्टप्राय समझा जाता है-
‘उदार का अन्न श्रद्धा से पवित्र होता है, और दूसरे का (कंजूस का) अन्न अश्रद्धा से नष्टप्राय हो जाता है।’ एक बार यज्ञ में प्रजापति ने उनका यह व्यवहार देखकर कहा—‘देवताओ! तुमने यह अनुचित किया है। वास्तव में उदार का अन्न उसकी श्रद्धा के कारण पवित्र है और कंजूस का अन्न उसकी अश्रद्धा के कारण अपवित्र एवं नष्टप्राय समझा जाता है।’
भीष्म उवाच