कपिल–स्यूमरश्मि संवादः
Kapila and Syūmaraśmi on Renunciation, Householder Support, and Epistemic Authority
ईद्शानशिवान् घोरानाचारानिह जाजले । केवलाचरितत्वात् तु निपुणो नावबुद्धयसे
जाजले! इस जगत में ऐसे बहुत-से अमंगलकारी और भयानक आचार प्रचलित हैं। केवल इस कारण कि वे पहले भी किए जाते रहे हैं, तुम चतुर होते हुए भी उनकी बुराई को नहीं समझ पाते।
तुलाधार उवाच